सर्दियों की धीमी प्रेमकथा
सर्दियाँ जब उतरती हैं
तो शोर नहीं करतीं
बस साँसों के आसपास
एक मुलायम-सी धुंध बुन देती हैं।
तुम खिड़की खोलकर
धूप को परखती हो,
जैसे कोई पुराना ख़त
दोबारा पढ़ रही हो।
धूप तुम्हारे कंधों पर टिककर
थोड़ी देर आराम करती है।
मैं दूर बैठा
तुम्हारी उस आदत पर मुस्कुराता हूँ—
तुम्हें ठंड से शिकायत रहती है,
पर तुम्हारी उँगलियाँ
हमेशा गुनगुनी रहती हैं।
हमारे बीच
चाय के कप से उठती भाप
धीरे-धीरे पुल बनाती है।
तुम कुछ कहती हो,
आधा सुनाई देता है,
आधा दिल समझ लेता है।
सर्दियों में प्रेम
तेज़ नहीं भागता
वह अंगीठी की आँच-सा है,
धीरे-धीरे सुलगता,
कभी धुआँ देता,
कभी चमक उठता।
तुम्हारी हँसी
ऊन के स्वेटर जैसी है
हल्की, पर बचा लेती है
हर ठंडी हवा से।
रात को जब कोहरा
शहर को ढक लेता है,
मैं सोचता हूँ—
तुम्हारे आने की आहट भी
ऐसी ही होगी,
धीमी, पर सब कुछ बदल देने वाली।
यह प्रेमकथा
किसी किताब में नहीं लिखी जाएगी,
यह तो बस
दो हथेलियों के बीच
ठहरती गर्माहट है
जो सर्दियों के बाद भी
लंबे समय तक
याद बनी रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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