ओस पिघलने से पहले
ओस पिघलने से पहले
सुबह बहुत मासूम होती है—
घास की नोक पर ठहरी बूँद
जैसे कोई अधूरी बात
जो होंठों तक आकर रुक गई हो।
तुम उसी वक़्त याद आती हो,
जब धूप अभी पूरी नहीं खुली होती,
और हवा में सर्दी
धीरे-धीरे अपना नाम लिख रही होती है।
मैं सोचता हूँ—
कहीं तुम भी
किसी खिड़की पर झुकी
हथेलियों में अपनी साँस की भाप भरकर
कुछ कहने की तैयारी में तो नहीं?
ओस पिघलने से पहले
कुछ भी कहा जा सकता है
बिना आवाज़ ऊँची किए,
बिना दुनिया को जगाए।
तुम होतीं तो
मैं तुम्हें पास बुलाता,
और कहता
देखो, ये जो बूँदें हैं न,
हमारी झिझक हैं।
धूप ज़रा-सी बढ़ेगी
और ये पिघल जाएँगी।
तुम हँसतीं
और तुम्हारी हँसी
पहली किरण की तरह
मेरे कंधे पर उतर आती।
फिर हम दोनों
उस क्षण को पकड़ लेते
जब ठंड और गर्माहट
एक ही जगह साथ खड़े होते हैं।
ओस पिघलने से पहले
प्रेम सबसे सच्चा होता है
नम, पारदर्शी,
और गिरने से पहले
आसमान को पूरी तरह थामे हुए।
मुकेश ,,,,,,,,
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