सर्दियों की धीमी प्रेमकथा
सर्दियाँ कभी अचानक नहीं आतीं,
वे पहले खिड़कियों पर हल्की दस्तक देती हैं,
फिर परदों में उलझ जाती हैं
और तुम्हारे नाम की भाप
चाय के कप से उठने लगती है।
तुम ऊनी शॉल में खुद को लपेटे
धूप से उलझती रहती हो
कहती हो, “आज कम है,”
और वही धूप
तुम्हारे गालों पर चुपके से
थोड़ी गुलाबी शरारत रख जाती है।
मैं आँगन में कुर्सी खींचकर बैठता हूँ,
तुम्हारे लिए जगह छोड़कर।
तुम आती नहीं,
पर तुम्हारी कल्पना
मेरे कंधे पर सिर रख देती है।
हमारे बीच
कुछ ओस की बूँदें पड़ी रहती हैं
अनकही बातों की तरह।
मैं उन्हें शब्दों की गर्मी से
धीरे-धीरे पिघलाता हूँ,
तुम अपनी हँसी से
उन्हें भाप बना देती हो।
रातें लंबी हो जाती हैं सर्दियों में,
पर तुम्हारी बकबक
उन्हें छोटा कर देती है।
तुम हर कहानी के बीच
बच्ची हो जाती हो,
और मैं हर बार
तुम्हें थोड़ा और समझने लगता हूँ।
मैंने बगीचे में
कुछ फूल सहेज रखे हैं
जो सिर्फ़ ठंड में महकते हैं।
उनकी खुशबू गाढ़ी है,
जैसे तुम्हारे आने का वादा।
सर्दियों की यह प्रेमकथा
तेज़ नहीं चलती
यह अंगीठी की आँच जैसी है,
धीरे-धीरे सुलगती,
हथेलियों में उतरती,
और फिर दिल के भीतर
एक स्थायी गर्माहट छोड़ जाती है।
जब तुम आओगी,
तो देखना
हमारे बीच की सारी ठंड
बस एक कहानी रह जाएगी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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