तुम्हें ठंड बहुत लगती है
पर रज़ाई से ज़्यादा
तुम्हें बहानों की आदत है
कि कोई बाँहें फैलाए
और तुम कह सको
“ज़रा और पास...”
शाम की सीढ़ियों पर बैठकर
तुम अक्सर आसमान को डाँटती हो,
कि बादल वक़्त पर क्यों नहीं आते।
फिर खुद ही
उनके आकारों में
अपना नाम ढूँढ़ने लगती हो।
तुम होती तो कहता
चलो, आज धूप को
अपने बीच बिठा लेते हैं,
वह गवाह रहे
कि हमने सर्दियों को
धीरे-धीरे हराया है।
तुम्हारी उँगलियों की ठिठुरन
मेरी हथेलियों में उतरती,
और मैं उसे
कोई कहानी समझकर
सहलाता रहता।
मैं बताता तुम्हें
घर के पिछवाड़े जो नीम है,
उसकी छाँव अब और गहरी हो गई है,
वहाँ एक चिड़िया
हर दोपहर तुम्हारा नाम पुकारती है।
रात में जब सब सो जाते हैं,
आँगन की मिट्टी
हल्की-सी महकती है
जैसे किसी ने
चुपके से इत्र छिड़का हो
तुम्हारे आने की राह में।
और सच कहूँ
मैंने चाँद से भी कह रखा है,
कि जिस दिन तुम आओ,
वह थोड़ा झुककर चमके,
ताकि तुम्हारे बालों में
रात आसानी से उतर सके।
बस तुम आओ—
बाक़ी सब इंतज़ार
मैं संभाल लूँगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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