बालों की छाँव में बैठी हुई दोपहर
तुम्हारे बालों की छाँव में
दोपहर आकर बैठ जाती है
जैसे तेज़ धूप को
अचानक कोई ठिकाना मिल गया हो।
वो तपती हुई रोशनी
लटों के नीचे नरम हो जाती है,
मानो गर्म हवाएँ भी
तुम्हारी मौजूदगी से
संभलकर चलने लगें।
कंधों पर गिरती छाया
एक छोटा-सा पेड़ बन जाती है,
जहाँ थकी हुई दोपहर
अपना माथा टिकाकर
साँस लेती है।
तुम हल्का-सा सिर झुका दो,
तो छाँव और गहरी हो जाती है
जैसे समय भी
दो पल सुस्ता लेना चाहता हो।
उस पल में
न कोई भागती सड़क,
न कोई शोर
बस तुम्हारे बालों की छाँव
और उसमें बैठी
एक सुकूनभरी दोपहर।
मैं चाहता हूँ
वहीँ ठहर जाऊँ
जहाँ धूप भी नर्म है,
और दुनिया
तुम्हारी छाया जितनी
खूबसूरत।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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