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Wednesday, 4 March 2026

बालों की छाँव में बैठी हुई दोपहर

 बालों की छाँव में बैठी हुई दोपहर


तुम्हारे बालों की छाँव में

दोपहर आकर बैठ जाती है

जैसे तेज़ धूप को

अचानक कोई ठिकाना मिल गया हो।


वो तपती हुई रोशनी

लटों के नीचे नरम हो जाती है,

मानो गर्म हवाएँ भी

तुम्हारी मौजूदगी से

संभलकर चलने लगें।


कंधों पर गिरती छाया

एक छोटा-सा पेड़ बन जाती है,

जहाँ थकी हुई दोपहर

अपना माथा टिकाकर

साँस लेती है।


तुम हल्का-सा सिर झुका दो,

तो छाँव और गहरी हो जाती है

जैसे समय भी

दो पल सुस्ता लेना चाहता हो।


उस पल में

न कोई भागती सड़क,

न कोई शोर

बस तुम्हारे बालों की छाँव

और उसमें बैठी

एक सुकूनभरी दोपहर।


मैं चाहता हूँ

वहीँ ठहर जाऊँ

जहाँ धूप भी नर्म है,

और दुनिया

तुम्हारी छाया जितनी

खूबसूरत।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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