“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
हम कुछ नहीं बोलते,
बस पास बैठे रहते हैं।
खिड़की से आती धूप
तुम्हारे चेहरे पर
धीरे-धीरे उतरती है।
और मुझे लगता है
दुनिया की सबसे सुंदर चीज़
यही
ख़ामोश दोपहर है।
मुकेश ,,,,,
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