अहिंसा और शक्ति का सिद्धांत
सभ्यता की यात्रा में
मनुष्य ने
शक्ति के कई रूप देखे हैं
तलवार की चमक,
सिंहासनों की कठोरता,
और
युद्धों की गूँज।
पर इन्हीं आवाज़ों के बीच
एक धीमा-सा शब्द भी जन्मा
अहिंसा।
पहली नज़र में
अहिंसा
कमज़ोरी जैसी लग सकती है,
जैसे कोई हाथ
प्रहार करने से
अपने आप को रोक ले।
पर इतिहास की गहराई में उतरकर देखें
तो पता चलता है
अहिंसा
सिर्फ़ प्रहार से बचना नहीं,
बल्कि
क्रोध की अग्नि को
चेतना की शांति में बदल देना है।
शक्ति
अक्सर बाहरी रूप में दिखाई देती है
सेनाएँ,
कानून,
और
सत्ता के आदेश।
वह
भय के माध्यम से
अपना प्रभाव स्थापित करती है।
पर अहिंसा
एक अलग प्रकार की शक्ति है।
वह
मनुष्य के भीतर जन्म लेती है
विवेक में,
धैर्य में,
और
उस साहस में
जो अन्याय के सामने
बिना हिंसा के खड़ा हो सके।
अहिंसा
कभी निष्क्रियता नहीं होती।
वह
अन्याय को स्वीकार नहीं करती,
पर उसका उत्तर
घृणा से नहीं देती।
यहीं
उसका रहस्य छिपा है।
जब शक्ति
हिंसा में बदल जाती है,
तो वह भय पैदा करती है।
और जब शक्ति
अहिंसा से जुड़ती है,
तो वह
मानवता को जागृत करती है।
इतिहास में
कई बार
हथियारों से बड़ी जीत
अहिंसा के साहस ने प्राप्त की है।
क्योंकि
तलवार
शरीर को झुका सकती है,
पर अहिंसा
अंतरात्मा को जगा देती है।
शायद
अहिंसा और शक्ति का असली सिद्धांत
यही है—
कि
सच्ची शक्ति
विनाश की क्षमता में नहीं,
संयम की क्षमता में छिपी होती है।
जब मनुष्य
अपने क्रोध को
सजगता में बदल देता है,
जब वह
घृणा के स्थान पर
समझ का मार्ग चुनता है—
तभी
अहिंसा
शक्ति का उच्चतम रूप बन जाती है।
और तब
सभ्यता
युद्ध की धूल से नहीं,
मानवता की रोशनी से
आगे बढ़ने लगती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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