सत्ता और विवेक का संघर्ष
सभ्यता की लंबी यात्रा में
दो शक्तियाँ
अक्सर आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं—
एक है सत्ता,
और दूसरी
विवेक।
सत्ता
हाथों में केंद्रित शक्ति है
राजसिंहासन,
कानून,
और आदेशों की कठोर आवाज़।
वह व्यवस्था बनाती है,
निर्णय लेती है,
और समाज की दिशा तय करती है।
पर मनुष्य के भीतर
एक और आवाज़ भी होती है—
मौन,
पर गहरी।
वही आवाज़ है
विवेक।
विवेक
किसी राजमहल में नहीं रहता,
वह
मनुष्य के अंत:करण में बसता है।
वह पूछता है
“क्या हर आदेश न्यायपूर्ण है?
क्या हर निर्णय
मानवता के अनुकूल है?”
यहीं से
संघर्ष शुरू होता है।
क्योंकि सत्ता
अक्सर स्थिरता चाहती है,
और विवेक
सत्य की खोज।
कभी
सत्ता अपने अधिकार के बल पर
विवेक को चुप कराना चाहती है,
और कभी
विवेक
सत्ता की आँखों में देखकर
धीरे से कहता है
“सत्य
आदेश से बड़ा होता है।”
इतिहास की हर बड़ी कथा में
यह संघर्ष दिखाई देता है।
किसी ने
अन्यायपूर्ण आदेश मानने से इंकार किया,
किसी ने
भीड़ के विरुद्ध खड़े होकर
सत्य का पक्ष लिया।
उस क्षण
विवेक
एक अकेली आवाज़ बन जाता है
पर वही आवाज़
धीरे-धीरे
युग की दिशा बदल देती है।
सत्ता
समय के साथ बदलती रहती है,
राज्य आते-जाते हैं,
सिंहासन टूटते और बनते हैं।
पर विवेक
मनुष्य की चेतना में
लगातार जीवित रहता है।
शायद
सभ्यता की सबसे बड़ी परीक्षा
यही है
कि सत्ता
विवेक को दबाए नहीं,
बल्कि
उसे सुनने का साहस रखे।
जब सत्ता
विवेक से दूर हो जाती है,
तो शक्ति
कठोरता में बदल जाती है।
और जब विवेक
सत्ता से संवाद करता है,
तो व्यवस्था
मानवता का रूप ले लेती है।
यही
सत्ता और विवेक का संघर्ष है
एक
शक्ति का विस्तार,
दूसरा
सत्य का प्रकाश।
और मनुष्य की आशा
हमेशा इसी में रही है—
कि
अंततः
सत्ता की ऊँची दीवारों के बीच भी
विवेक की छोटी-सी लौ
जलती रहे।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment