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Wednesday, 18 March 2026

साँसों की अनकही किताब

 साँसों की अनकही किताब


कभी-कभी

किसी की साँसों में

एक पूरी किताब छिपी होती है,


जिसे पढ़ने के लिए

अक्षरों की ज़रूरत नहीं पड़ती।


उसमें

कुछ पन्ने यादों के होते हैं,

कुछ पन्ने

अधूरे वादों के।


और कुछ पन्ने ऐसे

जिन पर सिर्फ़

ख़ामोशी लिखी होती है।


जब हवा

उन पन्नों को धीरे-धीरे पलटती है,

तो एक महक उठती है


जैसे

किसी पुराने ख़त से

अचानक

एक भूली हुई शाम बाहर आ गई हो।


शायद इसलिए

साँसों की किताब

कभी पूरी नहीं पढ़ी जाती


वह बस

महकती रहती है।


मुकेश ,,,,,,,,

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