विरह में बैठी शकुंतला और एक अकेली शाम
वन के किनारे
शाम उतर आई है
धीरे-धीरे
जैसे कोई थकी हुई रोशनी
पत्तों पर टिक गई हो।
वहीं
एक वृक्ष की छाया में
बैठी है शकुंतला—
आँखों में
दूर तक जाती हुई
एक प्रतीक्षा।
पक्षी लौट चुके हैं,
नदी भी
अपनी धुन में बह रही है,
पर उसका मन
अब भी
किसी कदमों की आहट सुनता है।
विरह
शायद ऐसा ही होता है—
शाम के साथ
थोड़ा और गहरा हो जाता है।
और उस शाम में
एक अकेली शकुंतला
अब भी
किसी दुष्यंत के आने की
धीमी-सी आशा
सहेजे बैठी है।
मुकेश ,,,,,,,,
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