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Saturday, 14 March 2026

विरह में बैठी शकुंतला और एक अकेली शाम

 विरह में बैठी शकुंतला और एक अकेली शाम


वन के किनारे

शाम उतर आई है

धीरे-धीरे

जैसे कोई थकी हुई रोशनी

पत्तों पर टिक गई हो।


वहीं

एक वृक्ष की छाया में

बैठी है शकुंतला—

आँखों में

दूर तक जाती हुई

एक प्रतीक्षा।


पक्षी लौट चुके हैं,

नदी भी

अपनी धुन में बह रही है,

पर उसका मन

अब भी

किसी कदमों की आहट सुनता है।


विरह

शायद ऐसा ही होता है—

शाम के साथ

थोड़ा और गहरा हो जाता है।


और उस शाम में

एक अकेली शकुंतला

अब भी

किसी दुष्यंत के आने की

धीमी-सी आशा

सहेजे बैठी है।


मुकेश ,,,,,,,,

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