सन्नाटे में लौटती हुई आवाज़
कभी-कभी
जब सब आवाज़ें थम जाती हैं
और रात
अपने गहरे सन्नाटे में
शहर को ढक लेती है,
तभी कहीं दूर से
एक आवाज़ लौटती है
धीमी,
परिचित,
जैसे किसी पुराने रास्ते की
भूली हुई आहट।
वह किसी और की नहीं होती,
वह हमारी ही होती है
जो समय के शोर में
कभी खो गई थी।
दिन के उजाले में
हम उसे सुन नहीं पाते
क्योंकि दुनिया की
अनगिनत पुकारें
उस पर परत-दर-परत
चढ़ती रहती हैं।
पर सन्नाटा
एक अजीब दर्पण है,
जिसमें
हर छुपी हुई ध्वनि
अपने असली रूप में
लौट आती है।
और तब
मनुष्य को महसूस होता है
कि वह आवाज़
कहीं बाहर से नहीं आई
वह तो
हमारे ही भीतर
किसी बंद कमरे में बैठी
लंबे समय से
हमारे लौटने का इंतज़ार कर रही थी।
सन्नाटे की यही ख़ूबी है
वह हमें
दुनिया से नहीं,
हमारी अपनी आवाज़ से
फिर मिलवा देता है।
मुकेश ,,,,,,,
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