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Tuesday, 3 March 2026

ढोल की थाप और धड़कन का हुड़दंग

 ढोल की थाप और धड़कन का हुड़दंग

फागुन ने जैसे ही चौक में पाँव रखा,

ढोल की थाप ने हवा को रंग दिया।

हर चोट के साथ

सीने में कोई पुराना शोर जागा—

धड़कन ने अपनी ही रफ़्तार पकड़ ली।


अबीर की धुंध में

चेहरे धुँधले होते गए,

पर तुम्हारी आँखों की चमक

स्पष्ट रही—

जैसे भीड़ में एक निजी उत्सव।


मृदंग की थिरकन

पाँवों से पहले रगों में उतरी,

मैंने जाना—

हुड़दंग बाहर कम,

भीतर ज़्यादा था।


तुमने जब हँसकर

रंग का छींटा फेंका,

ढोल की थाप एकदम से तेज़ हुई—

या शायद मेरी नब्ज़ ही उछली थी।


शाम ढले

जब गली में बस रंग की परतें बचीं,

ढोल थम गए,

पर दिल की धुन—

अब भी उसी थाप पर

तुम्हारा नाम बजा रही थी।


मुकेश ,,,,,,,,

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