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Thursday, 19 March 2026

चम्बल के जंगलों में प्रेम

 चम्बल के जंगलों में प्रेम


चम्बल के जंगलों में

जहाँ खामोशी भी

धूल की तरह उड़ती है,

और हवाएँ

किसी पुराने किस्से की तरह

खुरदुरी लगती हैं

वहीं कहीं

प्रेम भी जन्म लेता है।


यहाँ प्रेम

न शहरों जैसा नर्म नहीं होता,

न चाँदनी में पिघलता हुआ—

यह तो

बीहड़ों की दरारों में उगती

एक जिद्दी कोंपल है,

जो पत्थरों से टकराकर भी

हरा रहना जानती है।


दिन में

जब बंदूक की आवाज़

दूर तक गूंजती है,

और कदमों के निशान

रेत में खो जाते हैं,

तब भी

दो आँखें

एक-दूसरे को ढूंढ ही लेती हैं

जैसे

रेगिस्तान में पानी का भ्रम नहीं,

बल्कि सचमुच की प्यास हो।


रात आती है

तो चम्बल का आकाश

और भी गहरा हो जाता है,

तारे

जैसे किसी भागते हुए सपने के

टूटे हुए टुकड़े हों—

और उन्हीं टुकड़ों के बीच

दो दिल

चुपचाप धड़कते हैं।


यहाँ प्रेम

खतरे के साए में पलता है,

हर मुलाक़ात

एक जोखिम होती है,

हर छुअन

जैसे किसी सीमा को पार करना

फिर भी

ये दिल

डर से बड़ा होना सीख लेते हैं।


बीहड़ों की पगडंडियों पर

चलते-चलते

जब हाथ छू जाए अनजाने में,

तो वह स्पर्श

किसी शहर के सौ वादों से

ज्यादा सच्चा होता है—

क्योंकि यहाँ

शब्दों से ज़्यादा

खामोशियाँ बोलती हैं।


और शायद

इसीलिए

चम्बल के जंगलों में प्रेम

इतना गहरा होता है—

कि वह

न कानून से डरता है,

न किस्मत से हारता है,

बस

धड़कता रहता है

उस मिट्टी की तरह

जो हर ज़ख्म के बाद भी

जीना नहीं छोड़ती।


चम्बल में प्रेम

कोई कहानी नहीं

एक संघर्ष है,

एक सच्चाई है,

और सबसे बढ़कर

एक ऐसा एहसास है

जो साबित करता है—

कि जहाँ डर सबसे ज्यादा होता है,

वहीं

प्रेम सबसे बहादुर बनकर जन्म लेता है।


मुकेश ,

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