ज़िन्दगी की शाम, तन्हाई और तेरी यादें
शाम ढलती है
तो लगता है जैसे
ज़िन्दगी अपनी आख़िरी आयत पढ़ रही हो…
जंगल की इस सुनसान पुलिया पर बैठा मैं
अपने ही वजूद का मुसाफ़िर हूँ
न कोई मंज़िल, न कोई हमसफ़र,
बस धुएँ में घुलती हुई कुछ अधूरी दुआएँ…
ये जो हर कश में उठता है धुआँ,
ये तंबाकू नहीं
ये मेरी रूह के जले हुए हरफ़ हैं,
जो तेरे नाम से उठते हैं
और ख़ुदा तक पहुँचने से पहले
हवा में ही बिखर जाते हैं…
कभी तू थी
तो हर मना करना भी इबादत लगता था,
तेरी झुंझलाहट में भी रहमत थी,
और तेरे लफ़्ज़
मेरे गुनाहों का वुज़ू बन जाते थे…
अब तू नहीं है
तो हर इजाज़त भी सज़ा बन गई है,
कोई रोकने वाला नहीं
कोई टोकने वाला नहीं,
और मैं…
मैं अपनी ही ख़ामोशी का मुरीद हो गया हूँ।
डूबता हुआ ये सूरज
मेरी रगों में उतरता जाता है,
जैसे वक्त कह रहा हो
"हर रौशनी का अंजाम
आख़िरकार तन्हाई ही है…"
सूखे पत्तों की सरसराहट में
मैं तेरी आवाज़ तलाशता हूँ,
हर गिरता हुआ पत्ता
जैसे कोई वादा हो
जो निभ नहीं पाया…
तेरी याद—
अब कोई शख़्स नहीं,
एक सिलसिला है…
जो रुकता नहीं,
जो थमता नहीं,
जो हर रात मेरी रूह पर उतर आता है
सजदे की तरह…
मैंने अब मोहब्बत को
इश्क़ नहीं, फ़ना समझ लिया है
जहाँ कोई बचता नहीं,
बस एक नाम रह जाता है
जो हर साँस के साथ
धीरे-धीरे जलता है…
ये जो ज़िन्दगी की शाम है
ये सिर्फ़ वक़्त नहीं,
ये एक हक़ीक़त है…
जहाँ इंसान समझता है
कि सबसे गहरा रिश्ता
किसी और से नहीं,
अपनी तन्हाई से होता है…
और मैं…
अब उसी तन्हाई का दरवेश हूँ
जो तेरी यादों की चादर ओढ़े
हर रात
ख़ुद से मिलने निकल पड़ता है…
मुकेश ,
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