होंठों की गरमाहट, शाम की ख़ामोशी
शाम ने जब आकाश पर
बैंगनी साया बिछाया,
हम दोनों के बीच
एक मुलायम-सी चुप्पी उतर आई।
दूर कहीं परिंदे लौट रहे थे,
हवा में ठंडक की आहट थी,
और उस ठहरी हुई घड़ी में
तुम्हारे होंठों की गरमाहट
मेरे नाम की तरह सुलग रही थी।
कुछ लफ़्ज़ थे जो कहे जा सकते थे,
कुछ सवाल जो पूछे जा सकते थे,
पर हमने उन्हें हवा के हवाले कर दिया
कि इस ख़ामोशी को टूटने न दें।
तुम पास थे,
इतने पास कि धड़कनों का फ़ासला
सिमटकर एक साँस रह गया,
और उस एक साँस में
पूरा इश्क़ उतर आया।
शाम गहराती रही,
सितारे एक-एक कर जलते रहे,
और तुम्हारे होंठों की हल्की-सी तपिश
मेरे भीतर
एक लंबी रौशनी बनकर फैलती रही।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment