कप की किनारी पर ठहरा इकरार
सांझ की थमी हुई रोशनी में
जब तुमने कप होंठों से लगाया,
भाप ने हल्का-सा घेरा बनाया
जैसे कोई राज़
लफ़्ज़ बनने से पहले ही काँप गया हो।
कप की किनारी पर
तुम्हारे होंठों का निशान
ठहरा रहा देर तक,
और मैं उसे देखता रहा
मानो वहाँ कोई इकरार लिखा हो।
चाय की मिठास से ज़्यादा
उस लम्हे की गरमाहट थी,
जो उँगलियों से होते हुए
सीधे दिल तक उतर आई।
तुमने आँख उठाकर मुस्कुराया,
कुछ कहा नहीं
पर उस ख़ामोशी में
इतना कुछ था
कि सारी बातें छोटी लगने लगीं।
कप अब खाली है,
शाम भी ढल चुकी है,
पर किनारी पर ठहरा वह इकरार
अब भी मेरी रगों में
धीमे-धीमे बह रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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