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Tuesday, 3 March 2026

कप की किनारी पर ठहरा इकरार

कप की किनारी पर ठहरा इकरार

सांझ की थमी हुई रोशनी में

जब तुमने कप होंठों से लगाया,

भाप ने हल्का-सा घेरा बनाया 

जैसे कोई राज़

लफ़्ज़ बनने से पहले ही काँप गया हो।


कप की किनारी पर

तुम्हारे होंठों का निशान

ठहरा रहा देर तक,

और मैं उसे देखता रहा

मानो वहाँ कोई इकरार लिखा हो।


चाय की मिठास से ज़्यादा

उस लम्हे की गरमाहट थी,

जो उँगलियों से होते हुए

सीधे दिल तक उतर आई।


तुमने आँख उठाकर मुस्कुराया,

कुछ कहा नहीं 

पर उस ख़ामोशी में

इतना कुछ था

कि सारी बातें छोटी लगने लगीं।


कप अब खाली है,

शाम भी ढल चुकी है,

पर किनारी पर ठहरा वह इकरार

अब भी मेरी रगों में

धीमे-धीमे बह रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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