सुपरनोवा के बाद
जब एक तारा
अपनी ही आग से भरकर
स्वयं को सह नहीं पाता,
तो वह विस्फोट बन जाता है
एक अंतिम घोषणा,
प्रकाश की चरम चीख।
सुपरनोवा के बाद
आकाश कुछ क्षणों के लिए
असामान्य रूप से उजला हो जाता है,
मानो मृत्यु ने
जीवन से भी अधिक दीप्ति ओढ़ ली हो।
पर असली कथा
विस्फोट के बाद शुरू होती है।
तारकीय गर्भ में रचा गया लोहा,
कैल्शियम, निकेल,
और वे दुर्लभ तत्त्व
जो साधारण ज्वालाओं में नहीं बनते
सब अंतरिक्ष में बिखर जाते हैं।
धूल बनकर,
गैस बनकर,
वे फैलते हैं
नवजात निहारिकाओं की ओर।
विस्फोट का अवशेष
धीरे-धीरे ठंडा होता है
कहीं न्यूट्रॉन तारा जन्म लेता है,
इतना सघन
कि एक चम्मच पदार्थ
पर्वत के बराबर भारी हो।
कहीं ब्लैक होल
जहाँ गुरुत्व
इतना प्रबल
कि प्रकाश भी लौट नहीं पाता।
पर शून्य नहीं बनता कुछ भी।
सुपरनोवा के बाद
अर्थ बदलता है,
पदार्थ नहीं।
हमारी हड्डियों में जो कैल्शियम है,
रक्त में जो लोहा
संभव है
वह किसी ऐसे ही विस्फोट का अवशेष हो।
इस प्रकार
हर मृत्यु
किसी और जीवन का प्रारूप है।
सुपरनोवा के बाद
अंधकार स्थायी नहीं होता
वह गर्भ बन जाता है।
और ब्रह्मांड
अपने ही विघटन से
फिर एक नई रचना की तैयारी करता है।
प्रकाश की अंतिम चीख
दरअसल
एक दीर्घ प्रतिध्वनि है
जिसमें भविष्य
धीरे-धीरे आकार ले रहा होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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