गालों में डिंपल वाली लड़की (तीन )
वो गालों में डिंपल वाली लड़की
जैसे हँसी की कोई गुप्त तह हो,
जहाँ हर मुस्कान
पहले दस्तक देती है
फिर धीरे से खिलती है।
उसके चेहरे पर धूप
सीधी नहीं उतरती,
पहले उस छोटे-से मोड़ पर ठहरती है,
फिर रौशनी बनकर
चारों तरफ़ फैल जाती है।
जब वह बेख़याली में हँसती है,
तो लगता है
वक़्त भी पल भर को
उस डिंपल में गिरकर
गोल-गोल घूमने लगता है।
वो नन्हा-सा भंवर
नदी का नहीं,
किसी ख़्वाब का लगता है—
जहाँ उतरते ही
दिल अपनी दिशा भूल जाए।
कितनी अजीब बात है,
इतना छोटा-सा निशान
इतनी बड़ी हलचल जगा देता है
कि देखने वाला
बस देखता ही रह जाए।
वो गालों में डिंपल वाली लड़की
दरअसल एक रहस्य है,
जिसे समझा नहीं जाता,
बस महसूस किया जाता है
हर बार,
पहली बार की तरह।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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