होठों के कोने की हल्की सी मुस्कान
तुम जब पूरी तरह नहीं हँसती,
बस होठों के कोने पर
एक हल्की सी रेखा उभरती है
वहीं से सुबह शुरू होती है।
वो मुस्कान शोर नहीं करती,
न खिलखिलाती है,
बस धीरे से खुलती है
जैसे किसी ख़त का पहला मोड़।
उसके भीतर
कुछ अनकहे राज़ होते हैं,
कुछ आधे-अधूरे इकरार,
कुछ शरमाई हुई स्वीकृतियाँ।
मैंने कई बार देखा है—
तुम कुछ और कहती हो,
पर होठों का वह कोना
सच बता देता है।
वो हल्की सी मुस्कान
दिल पर ज़ोर से नहीं गिरती,
बस आकर ठहर जाती है
जैसे शाम की धूप
खिड़की के किनारे।
और देखने वाला
उसी ठहराव में
अपनी धड़कनें गिनने लगता है।
होठों के कोने की वह नर्म लकीर
दरअसल इश्क़ का सबसे सादा रूप है—
कम शब्द,
ज़्यादा असर।
मुकेश ,,,,,,,,
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