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Wednesday, 4 March 2026

खुले बालों में अटकी हुई शाम

 खुले बालों में अटकी हुई शाम


खुले बालों में

जब शाम आकर ठहरती है,

लगता है जैसे दिन ने

अपना आख़िरी रंग

तुम्हारी लटों में छुपा दिया हो।


सूरज की ढलती किरणें

उन बालों में उलझकर

सुनहरी हो जाती हैं

मानो अँधेरा भी

तुमसे इजाज़त लेकर ही आए।


तुम हल्का-सा सिर झटकती हो,

तो शाम बिखर जाती है—

थोड़ी-सी रोशनी

थोड़ा-सा साया,

दोनों साथ-साथ झूम उठते हैं।


मैंने देखा है,

तुम्हारे खुले बाल

सिर्फ़ बाल नहीं होते

वे एक पूरा आकाश होते हैं,

जहाँ दिन और रात

एक ही क्षण में मिलते हैं।


उस अटकी हुई शाम में

एक अनकहा सुकून है

न पूरी रौशनी,

न पूरा अँधेरा,

बस एक नरम-सा जादू

जो दिल को

धीरे-धीरे अपने घेरे में ले लेता है।


तुम्हारे खुले बालों में

जब भी शाम उतरती है,

दुनिया थोड़ी थम जाती है

और मैं

उसी ठहरे हुए पल में

खुद को भूल जाता हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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