एक दिन एहसास ने आकर दरवाज़ा खटखटाया
एक दिन
एहसास ने
आकर दरवाज़ा खटखटाया
कोई आवाज़ नहीं थी,
बस
भीतर कुछ
हल्का-सा हिल गया।
मैंने सोचा
कौन होगा
पर नाम
कोई नहीं था।
दरवाज़ा खोला
तो सामने
कोई खड़ा नहीं था,
फिर भी
कोई था
जो भीतर चला आया।
कमरा वैसा ही रहा,
पर हवा बदल गई—
जैसे
ख़ामोशी ने
कुछ कह दिया हो।
मनोविज्ञान कहता है
कुछ अनुभव
दरवाज़े से नहीं आते,
वे सीधे
भीतर उतरते हैं।
उस दिन के बाद
मैं अकेला नहीं रहा
क्योंकि
कोई आया नहीं था,
फिर भी
कुछ
मेरे साथ रह गया…।
मुकेश ,,,,,,,,
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