नाक की लौ में जलती शरारत
तुम्हारी नाक की लौ पर
एक नन्ही-सी रौशनी ठहरी रहती है
जैसे किसी दीये की बाती पर
शरारत ने चुपचाप आग धर दी हो।
जब तुम रूठने का अभिनय करती हो,
वही लौ ज़रा-सी तेज़ हो उठती है,
और मैं समझ जाता हूँ—
यह ग़ुस्सा नहीं,
मोहब्बत का खेल है।
तुम हँसकर मुँह फेर लो तो
वो चमक और गहरी हो जाती है,
मानो चाँद ने
अपनी किरन वहीं बाँध दी हो।
उस छोटी-सी चमक में
न जाने कितनी कहानियाँ हैं
थोड़ी अकड़,
थोड़ी अदा,
थोड़ी मासूम सी ज़िद।
मैंने देखा है,
जब भी तुम्हें छेड़ा जाए,
सबसे पहले वही लौ काँपती है
फिर होंठों पर मुस्कान आती है।
नाक की उस नन्ही सी चमक में
दरअसल पूरा मौसम बसता है
जहाँ फागुन, चाँदनी और शरारत
एक साथ जलते हैं,
और दिल
उस उजाले में
खुद को भूल जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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