अंतरिक्ष भीतर का — सूर्य, चंद्र और नक्षत्र
कभी-कभी
लगता है
मेरे भीतर कोई कुंडली खुलती है,
जिसमें लग्न हर सुबह
सूर्य के साथ उगता है।
एक तेज़, प्रखर सूर्य
मेरे नाभि-आकाश में धधकता है
अहं नहीं,
बल्कि चेतना का अग्नि-बिंदु,
जो कर्मों को पकाता है,
और मुझे
मेरे ही केंद्र की ओर धकेलता है।
दिन भर
वो सूर्य
दृष्टियाँ डालता है
कभी दशम भाव में महत्वाकांक्षा,
कभी चतुर्थ में बेचैनी,
कभी सप्तम में
तुम्हारी परछाईं जगा देता है।
फिर सांझ
जब प्रकाश ढलता है,
तो लगता है
जैसे सूर्य
मेरे ही बारहवें भाव में डूब गया हो,
त्याग बनकर,
विरक्ति बनकर।
और रात…
मेरे हृदय में एक चंद्र उगता है
शीतल,
पर उधार की रौशनी लिए,
जैसे स्मृतियों का दर्पण हो।
वो चंद्र
मेरी भावनाओं के ज्वार उठाता है,
कभी पूर्णिमा
तो सब कुछ उजला,
कभी अमावस—
तो भीतर का सारा आकाश
एक गहरी चुप में डूबा।
मेरे मन के नक्षत्र
रोहिणी की कोमलता,
मृगशिरा की तलाश,
अनुराधा का प्रेम,
और शतभिषा की रहस्यमयी दूरी
सब मेरे भीतर
अपनी-अपनी चाल चलते हैं।
कभी राहु-सा भ्रम
मुझे मेरे ही साए में उलझा देता है,
तो केतु-सा वैराग्य
सब बंधनों को काटकर
मुझे शून्य की ओर खींचता है।
और इन सब के बीच—
मैं…
ना केवल ग्रह,
ना केवल भाव,
ना केवल दशा
बल्कि एक साक्षी,
जो इस पूरी जन्मपत्री को
भीतर ही भीतर पढ़ रहा है।
कभी सोचता हूँ
क्या ये आकाश बाहर है?
या मैं ही
किसी ब्रह्मांड का
चलता-फिरता ज्योतिष हूँ?
जहाँ हर दिन
एक नया गोचर होता है,
हर रात
एक नई व्याख्या,
और हर जन्म
सिर्फ़ एक कोशिश
खुद को समझने की।
और शायद—
जब ये समझ पूरी हो जाएगी,
तब ना सूर्य बचेगा,
ना चंद्र,
ना नक्षत्र…
बस एक प्रकाश होगा
जो कभी उदय नहीं होता,
और कभी अस्त भी नहीं।
मुकेश ,,,,,,,
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