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Monday, 30 March 2026

मैं—जो हर जगह होकर भी कहीं नहीं

 मैं—जो हर जगह होकर भी कहीं नहीं


कई बार यूँ लगता है

मेरे भीतर सिर्फ़ सूरज-चाँद ही नहीं,

एक पूरा आसमान सांस लेता है

फैलता हुआ, सिमटता हुआ,

बिना किसी किनारे के।


सुबह

मेरे सीने से एक रौशनी उठती है,

जो रास्ते नहीं खोजती,

बस खुद ही रास्ता बनती चली जाती है

और मैं उसके पीछे

एक साया-सा चलता रहता हूँ।


दिन भर

वो उजाला मुझमें

कुछ जलाता है, कुछ गढ़ता है,

कुछ तोड़ता है, कुछ जोड़ता है

जैसे हर धड़कन

एक नई सृष्टि रच रही हो।


और जब शाम

थककर मेरी रगों में उतरती है,

तो लगता है

मैं खुद ही

अपने भीतर के किसी समंदर में

डूब गया हूँ

खारा, गहरा, बेआवाज़।


रात होते ही

एक चाँद नहीं,

कई चाँद उगते हैं

कुछ यादों के,

कुछ ख्वाबों के,

कुछ उन सवालों के

जो कभी पूछे ही नहीं गए।


सितारे भी

बाहर के नहीं लगते,

जैसे मेरी ही सोच के टुकड़े हों,

जो अँधेरे में चमकना सीख गए हों।


और इन सब के बीच

मैं…

कभी एक कण बन जाता हूँ,

कभी पूरा ब्रह्मांड,

कभी एक सवाल,

जिसका कोई जवाब नहीं।


अजीब है ये होना

सब में होकर भी

कहीं न होना,

जैसे वजूद

खुद को ही ढूँढता रह गया हो।


शायद

मैं कोई एक “मैं” नहीं,

बल्कि अनगिनत “मैं” का संगम हूँ

जो हर रोज़

उगते हैं,

जलते हैं,

और फिर

खुद में ही

लौट जाते हैं।


मुकेश ,,,,,


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