पानी में जलती हुई आग का रहस्य- दो
यह कोई कथा नहीं—
यह अनुभव है,
जो शब्दों से पहले जन्म लेता है
और समझ के बाद भी
अधूरा रह जाता है।
पानी
जिसे तुम शांति कहते हो,
और आग—
जिसे तुम पीड़ा समझते हो,
दोनों
एक ही अस्तित्व की
दो तरंगें हैं।
ऋषियों ने कहा था
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”
और मैं सोचता रहा—
यदि सब ब्रह्म है,
तो यह जल और यह अग्नि
अलग कैसे?
फिर एक दिन
मैंने देखा
पानी के भीतर
कुछ जल रहा है,
कोई लपट नहीं,
कोई धुआँ नहीं,
फिर भी
एक निरंतर दाह।
वह इच्छा थी
अधूरी,
अनाम,
जो कभी पूरी नहीं हुई,
पर समाप्त भी नहीं हुई।
वह कर्म था
जो किया गया,
पर समझा नहीं गया।
उपनिषद कहते हैं
“यथा कर्म, तथा फल,”
पर कोई यह नहीं बताता
कि फल केवल बाहर नहीं आता,
वह भीतर भी जलता है—
पानी के भीतर
आग बनकर।
मैंने अपने भीतर देखा
शांत दिखने वाली सतह के नीचे
एक उथल-पुथल थी,
जहाँ हर स्मृति
एक चिनगारी थी,
और हर इच्छा
एक छुपी हुई ज्वाला।
मैं सोचता था
मैं शांत हूँ,
मैं स्थिर हूँ,
पर यह स्थिरता
केवल सतह की थी,
गहराई में
मैं लगातार जल रहा था।
और यही रहस्य है
पानी में जलती हुई आग
कोई विरोध नहीं,
बल्कि
अज्ञान का प्रतीक है।
जहाँ हम
अपने ही कर्मों के परिणाम को
पहचान नहीं पाते,
और उसे
भाग्य या संयोग कहकर
भूल जाते हैं।
फिर भी
वह जलता रहता है
धीरे-धीरे,
अदृश्य रूप में,
जब तक
हम उसे देख न लें।
एक क्षण आया
जब मैंने भागना बंद किया,
और उस जलती हुई आग को
देखने का साहस किया।
वह भयावह नहीं थी,
वह केवल
सत्य थी।
उसने मुझसे कुछ नहीं कहा,
बस
मुझे मेरे ही कर्मों का
दर्पण दिखाया।
और उसी क्षण
एक और रहस्य खुला
कि आग
पानी को नहीं जला रही थी,
और पानी
आग को बुझा नहीं रहा था,
दोनों
एक-दूसरे को
समझ रहे थे।
जैसे चेतना
अपने ही द्वंद्व को
धीरे-धीरे
स्वीकार कर रही हो।
उपनिषद की एक ध्वनि
भीतर उठी
“नेति, नेति…”
यह भी नहीं,
वह भी नहीं
तो फिर यह क्या है?
न पानी,
न आग
यह वह साक्षी है,
जो दोनों को देख रहा है।
जब यह समझ
अंदर उतरती है,
तो आग
धीरे-धीरे
अपना दाह खो देती है,
और पानी
अपनी बेचैनी।
अब न जलन है,
न ठंडक
बस
एक मौन संतुलन।
और वहीं
रहस्य समाप्त नहीं होता,
वह प्रकट होता है।
कि पानी में जलती हुई आग
कोई चमत्कार नहीं,
बल्कि
हमारी ही चेतना का
अधूरा ज्ञान है।
जब तक हम
अपने कर्मों को
अपना नहीं मानते,
वे जलते रहते हैं
भीतर,
पानी के नीचे,
अदृश्य।
और जब हम
उन्हें देख लेते हैं
तो वही आग
प्रकाश बन जाती है।
और वही पानी
गहराई।
शायद यही—
अग्नि और जल का मिलन है,
जहाँ द्वंद्व समाप्त नहीं होता,
बल्कि
एक उच्चतर समझ में
परिवर्तित हो जाता है।
और तब
पानी में जलती हुई आग
रहस्य नहीं रहती,
वह
स्वयं का
प्रकाश बन जाती है।
मुकेश ,,,,,,,
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