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Monday, 16 March 2026

इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला

 इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला


इश्क़

कभी-कभी

रेगिस्तान से गुज़रते

एक पुराने क़ाफ़िले जैसा होता है


जो दूर कहीं

धूल और धूप के बीच

धीरे-धीरे चलता दिखाई देता है।


कुछ रूहें

उसके साथ थोड़ी दूर तक चलती हैं,

कुछ

किसी मोड़ पर

ख़ामोशी से बिछड़ जाती हैं।


किसी को

मंज़िल मिल जाती है,

और कोई

राह की तन्हाई में

ख़ुद से मिलने लगता है।


मगर इश्क़ का क़ाफ़िला

अजीब होता है

वो कभी पूरी तरह

मिलता भी नहीं

और कभी पूरी तरह

खोता भी नहीं।


वो बस

यादों की रेत पर

अपने निशान छोड़ता हुआ

आगे बढ़ जाता है।


पीछे रह जाती हैं

कुछ बुझती हुई शामें,

कुछ अधूरे क़दम,

और दिल के अंदर

एक धीमी-सी सदा


कि शायद

किसी और सफ़र में

किसी और वक़्त

फिर मिल जाए


वही

इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला


मुकेश ,,,,,

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