बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम्… सोऽहमस्मि” — ‘पुरुष’ पद का परम अद्वैतार्थ -निबंधात्मक विवेचन, षोडश मन्त्र
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम् इति पुरुषः,
पुरि-शयनात् वा पुरुषः।
सः अहम् अस्मि — भवामि॥१६॥
ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र के अंतिम भाग— “सोऽहमस्मि”— का यह शांकरभाष्य अद्वैत वेदान्त के चरम सत्य को उद्घाटित करता है। आदि शंकराचार्य यहाँ “पुरुष” शब्द की व्युत्पत्ति और उसके तात्त्विक अर्थ को स्पष्ट करते हुए यह सिद्ध करते हैं कि उपास्य देवता और साधक का आत्मा— दोनों वास्तव में एक ही हैं।
“बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम्” — समष्टि-चेतना का स्वरूप
यहाँ “बुद्ध्यात्मना” का अर्थ है—
बुद्धि के रूप में स्थित आत्मा
अर्थात्—
वही चेतना
जो समस्त जगत् में बुद्धि के रूप में प्रकट होती है
इस प्रकार—
“पुरुष” वह है—
जो सम्पूर्ण जगत् में
चेतन सत्ता के रूप में व्याप्त है
यह—
समष्टि-चैतन्य (cosmic consciousness) है
“पुरुषः” — व्युत्पत्ति और अर्थ
शंकराचार्य “पुरुष” शब्द की दो प्रकार से व्याख्या करते हैं—
1. बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम् इति पुरुषः
जो सम्पूर्ण जगत् को आत्मरूप से धारण करता है
2. पुरि-शयनात् पुरुषः
“पुरि” (नगर, अर्थात् शरीर) में जो शयन करता है
अर्थात्—
यह चेतना
प्रत्येक शरीर में निवास करती है
इस प्रकार—
वही एक “पुरुष”
सबमें व्याप्त है
“सोऽहमस्मि” — अद्वैत का प्रत्यक्ष उद्घोष
अब साधक कहता है—
“सः अहम् अस्मि”
अर्थात्—
“वह (पुरुष) मैं हूँ”
यहाँ—
उपासक और उपास्य का भेद समाप्त हो जाता है
देवता और जीव का अंतर मिट जाता है
यह—
अद्वैत वेदान्त का चरम सत्य है
“भवामि” — अनुभूति की पुष्टि
“भवामि” शब्द यह संकेत करता है कि—
यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं
बल्कि जीवित अनुभव है
साधक—
उस सत्य को “हो” जाता है
उपासना से ज्ञान तक की यात्रा
इस एक पद में सम्पूर्ण साधना-पथ समाहित है—
देवता की उपासना
उसके स्वरूप का ज्ञान
उससे अभेद-बोध
“सोऽहमस्मि” की अनुभूति
दार्शनिक गहराई
यह भाष्य यह सिखाता है कि—
“पुरुष” कोई बाह्य सत्ता नहीं
वही आत्मा है
और—
जो ब्रह्माण्ड में है
वही मेरे भीतर है
अतः—
भेद केवल अज्ञान का परिणाम है
दृष्टांत
जैसे—
एक ही आकाश विभिन्न घड़ों में अलग-अलग प्रतीत होता है,
परन्तु वास्तव में वह एक ही है—
उसी प्रकार—
एक ही चेतना
अनेक शरीरों में भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि—
“पुरुष” = समष्टि-चेतना
“पुरि-शयन” = प्रत्येक शरीर में निवास
“सोऽहमस्मि” = अद्वैत का प्रत्यक्ष अनुभव
अतः—
यह मन्त्र उपासना का अंत और आत्मज्ञान का आरम्भ है।
यही—
वेदान्त का परम निष्कर्ष है—
“जो वहाँ है, वही यहाँ है;
जो ब्रह्म है, वही आत्मा है।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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