एक पोती
अपनी बूढ़ी दादी के बाल संवार रही थी
धीरे-धीरे
जैसे हर उलझन को
सुलझाते हुए
वह समय को भी पीछे मोड़ देना चाहती हो
दादी की खोपड़ी पर
उभरी हुई नसें थीं
और बाल
इतने हल्के
कि कंघी भी
संभलकर चल रही थी
पोती
हर बार कंघी रोककर पूछती—
“दर्द तो नहीं हो रहा?”
दादी
मुस्कुरा देती
जैसे दर्द
अब एक पुराना रिश्ता हो
उसके हाथों में
कोई जल्दी नहीं थी
न ट्रेन पकड़नी थी
न किसी कॉल का जवाब देना था
बस
उस पल को
थोड़ा और लंबा करना था
मैं पास बैठा सोच रहा था :
कभी
इसी दादी ने
इस बच्ची के बालों में तेल लगाया होगा
चोटी बाँधी होगी
उसे स्कूल भेजा होगा
आज
समय ने
दोनों को बदल दिया है—
लेकिन
हाथों का स्पर्श
अब भी वैसा ही है
पोती ने
दादी के बालों में चुटकी भर तेल लगाया
और धीरे से कहा—
“आपके बाल बहुत अच्छे हैं…”
दादी हँस पड़ी
जैसे उसे पता हो
कि यह सच नहीं है
लेकिन
उसे यह भी पता था
कि यह प्यार है
मैंने देखा—
इस दृश्य में
कोई बड़ी बात नहीं थी
न कोई दर्शन
न कोई उपदेश
फिर भी
यह
सबसे गहरी बात कह रहा था :
कि
जीवन अंत में
यादों का नहीं
स्पर्श का खेल है
बाल सुलझाते-सुलझाते
पोती
धीरे-धीरे
दादी के समय में उतर रही थी
और दादी
चुपचाप
अपने अंत से लौटकर
उसके बचपन में बैठ रही थी
मैंने आँखें झुका लीं
कुछ रिश्ते
देखे नहीं जाते—
बस
महसूस किए जाते हैं।
वक़्त नन्ही कांपता है
कांपते हैं हम , जैसे कांपते हैं हरे पत्ते
बहती हवा में बहती है हवा , कांपते हैं हम
हम कांपते हैं तो कांपती है मनुष्यता
मनुष्यता का कांपना ठीक नहीं ज़रा भी
काँपता है मनुष्य तो कांपती है सृष्टि
तब सृष्टि में रहते हैं जो भी , कांपते हैं सब
वक़्त नहीं कांपता है isee tarz pe ek aur nazm likhiye
समय चुप रहता है
चुप रहते हैं हम, जैसे चुप रहती है धूप
डूबती साँझ के किनारों पर
हम चुप रहते हैं
तो चुप हो जाती है भाषा
शब्द अपने अर्थ खो देते हैं
और अर्थ
धीरे-धीरे अँधेरे में घुलने लगते हैं
भाषा का चुप हो जाना
ठीक नहीं होता ज़रा भी
जब शब्द नहीं बोलते
तो सच भी कहीं छुप जाता है
और झूठ
बिना आवाज़ के फैलने लगता है
हम चुप होते हैं
तो चुप हो जाती है मनुष्यता
और मनुष्यता का चुप रहना
किसी तूफ़ान से कम नहीं
तब सृष्टि में
जो भी सांस ले रहा है
उसकी आवाज़
धीरे-धीरे कम होने लगती है
पेड़ चुप हो जाते हैं
नदियाँ धीमी पड़ जाती हैं
आकाश
अपना विस्तार समेट लेता है
लेकिन
समय
फिर भी चुप नहीं होता
वह
हर चुप्पी के भीतर
धीरे-धीरे
एक आवाज़ उगाता रहता है।
aise hee kuch aur paanch unvan bataiye
यहाँ उसी तेवर और दार्शनिक गहराई के पाँच शीर्षक (उन्मुख/उनवान) हैं—
“जब डर साँस लेता है, ब्रह्मांड सिमटने लगता है”
“मनुष्य के भीतर का शोर, सृष्टि की खामोशी बन जाता है”
“जब आँखें बंद होती हैं, दृश्य मरने लगते हैं”
“विश्वास के टूटते ही, समय भी दरकने लगता है”
“एक मनुष्य का अकेलापन, पूरी सृष्टि की दरार है”
अगर चाहें तो
मैं इन में से किसी एक पर पूरी नज़्म भी रच सकता हूँ।
“जब डर साँस लेता है, ब्रह्मांड सिमटने लगता है”
जब डर साँस लेता है
धीरे-धीरे
अंदर कहीं
सिमटने लगती हैं दिशाएँ
जैसे आकाश
अपने ही भीतर मुड़ रहा हो
हम डरते हैं
तो कदम छोटे हो जाते हैं
आवाज़ हल्की
और आँखें
खुले होते हुए भी
देखना छोड़ देती हैं
डर
कोई शोर नहीं करता
वह चुपचाप
रगों में उतरता है
और फिर
हमारे होने की जगह
थोड़ी-थोड़ी कम कर देता है
एक आदमी डरता है
तो उसका घर छोटा हो जाता है
एक शहर डरता है
तो उसकी गलियाँ खाली हो जाती हैं
और जब
मनुष्य डरता है
तो ब्रह्मांड
अपना विस्तार खोने लगता है
पेड़
हवा को कम पकड़ते हैं
नदियाँ
धीमे बहने लगती हैं
आकाश
अपनी ऊँचाई
किसी अदृश्य डर के आगे
झुका देता है
डर
दरअसल
हमारे भीतर का अँधेरा नहीं है
वह
हमारे भीतर की रोशनी का
पीछे हट जाना है
जब हम डरते हैं
तो हम
थोड़ा-थोड़ा कम हो जाते हैं
और जब हम
कम होते हैं
तो ब्रह्मांड भी
हमारे साथ
थोड़ा सिमट जाता है
लेकिन
कहीं न कहीं
एक बहुत सूक्ष्म जगह पर
एक साहस
अब भी साँस ले रहा होता है
और जैसे ही
वह एक साँस भरता है—
ब्रह्मांड
फिर से
फैलने लगता है।
मनुष्य के भीतर का शोर, सृष्टि की खामोशी बन जाता है
मनुष्य के भीतर का शोर
धीरे-धीरे भरता है
जैसे कुएँ में
अदृश्य पानी
बाहर सब शांत दिखता है
पेड़ स्थिर
आकाश निर्विकार
लेकिन भीतर
विचारों की भीड़
एक-दूसरे से टकराती रहती है
हम बोलते कम हैं
सोचते ज़्यादा
और सोचते भी ऐसे
जैसे हर विचार
अंतिम हो
यह शोर
कानों से नहीं सुनाई देता
यह
रगों में बहता है
नींद में
सपनों का रूप लेता है
और जागते में
बेचैनी का
जब यह शोर बढ़ता है
तो शब्द
अपनी जगह खो देते हैं
बातें
अधूरी रह जाती हैं
और रिश्ते
बिना कारण टूटने लगते हैं
एक मनुष्य के भीतर
जब बहुत शोर होता है
तो वह
बाहर की दुनिया से
धीरे-धीरे कटने लगता है
और तब
सृष्टि
उसके लिए
खामोश हो जाती है
नदियाँ बहती रहती हैं
पर उसे सुनाई नहीं देतीं
पत्ते हिलते हैं
पर उसमें कोई संगीत नहीं बचता
आकाश
फैला रहता है
पर उसमें कोई प्रश्न नहीं उठता
यह खामोशी
सुकून की नहीं होती
यह
एक ऐसे शोर की परिणति है
जो
इतना बढ़ गया है
कि सब कुछ
डुबो चुका है
लेकिन
अगर कभी
मनुष्य अपने भीतर
थोड़ी जगह बना ले
थोड़ा ठहर जाए
थोड़ा सुन ले
तो
उसी शोर के बीच
एक बहुत महीन ध्वनि
जन्म लेती है
और वही ध्वनि
धीरे-धीरे
सृष्टि को फिर से
बोलना सिखाती है।
जब आँखें बंद होती हैं, दृश्य मरने लगते हैं”
जब आँखें बंद होती हैं
दृश्य मरने लगते हैं
धीरे-धीरे
जैसे रोशनी
अपना सामान समेट रही हो
हम आँखें बंद करते हैं
तो सिर्फ अँधेरा नहीं आता
आते हैं अधूरे चेहरे
अधूरे रास्ते
और कुछ ऐसे दृश्य
जो कभी पूरे नहीं हुए
दुनिया वहीं रहती है
पेड़
सड़कें
लोग
सब अपनी जगह
लेकिन
हमारे लिए
वे सब
थोड़ा-थोड़ा खत्म होने लगते हैं
देखना
सिर्फ आँखों का काम नहीं है
यह
यादों और विश्वास का भी काम है
और जब आँखें बंद होती हैं
तो विश्वास
धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है
एक आदमी
जब सच से आँखें बंद करता है
तो सच
मरने नहीं लगता
लेकिन
उसके भीतर
सच की जगह
कम होने लगती है
हम जितना कम देखते हैं
उतना कम समझते हैं
और जितना कम समझते हैं
उतना ज़्यादा डरते हैं
आँखें बंद करना
कभी-कभी आराम होता है
लेकिन
हर बार
आराम नहीं होता
कभी-कभी
यह
दृश्यों की हत्या भी होती है
फिर भी
हर बंद आँख के भीतर
एक छोटी-सी रोशनी
जिंदा रहती है
वह
सपनों की तरह
धीरे-धीरे
नई तस्वीरें बनाती है
और जब आँखें खुलती हैं
तो कुछ पुराने दृश्य
वापस नहीं आते
लेकिन
कुछ नए दृश्य
पहली बार
जन्म लेते हैं।
विश्वास के टूटते ही, समय भी दरकने लगता है”
विश्वास के टूटते ही
समय भी दरकने लगता है
धीरे-धीरे
जैसे काँच में
पहली महीन रेखा उतरती है
हम सोचते हैं
टूटा है सिर्फ भरोसा
पर सच यह है
टूटती है निरंतरता
कल
आज से अलग हो जाता है
और आज
कल से कोई रिश्ता नहीं रखता
घड़ी चलती रहती है
पर समय
वैसा नहीं रहता
उसकी चाल में
एक अनजानी रुकावट आ जाती है
जैसे हर सेकंड
किसी शक से गुज़र रहा हो
एक विश्वास
कई सालों में बनता है
और एक क्षण में
अपने ही भार से गिर पड़ता है
जब वह गिरता है
तो सिर्फ दिल नहीं टूटता
समय भी
टुकड़ों में बिखर जाता है
रिश्तों की स्मृतियाँ
अलग-अलग कोनों में
जमने लगती हैं
कोई हँसी
अब संदिग्ध लगती है
कोई बात
अब पूरी नहीं लगती
विश्वास
दरअसल समय की डोरी है
जिससे हम
अतीत को
वर्तमान से बाँधते हैं
और जैसे ही वह डोरी टूटती है
समय
अपने ही भीतर
बिखरने लगता है
तब
मनुष्य
सिर्फ आगे नहीं बढ़ता
वह
हर कदम पर
पीछे भी लौटता है
लेकिन
दरारें
हमेशा अंत नहीं होतीं
कभी-कभी
वहीं से
रोशनी भी भीतर आती है
और शायद
एक नया विश्वास
उसी दरकते हुए समय में
धीरे-धीरे
फिर से जन्म लेता है।
एक मनुष्य का अकेलापन, पूरी सृष्टि की दरार है”
एक मनुष्य का अकेलापन
पूरी सृष्टि की दरार है
यह बात
धीरे-धीरे समझ में आती है
जैसे किसी पुराने घर की दीवार
अचानक एक दिन
अपनी दरकन दिखा दे
वह अकेला बैठा होता है
भीड़ के बीच भी
उसके आसपास
आवाज़ें चलती रहती हैं
पर कोई आवाज़
उस तक नहीं पहुँचती
अकेलापन
कोई खाली जगह नहीं है
यह
एक भरी हुई चुप्पी है
जिसमें
कई अनकहे वाक्य
घुटते रहते हैं
जब एक मनुष्य
अंदर से टूटता है
तो उसकी दरार
सिर्फ उसी तक सीमित नहीं रहती
वह
धीरे-धीरे
रिश्तों में उतरती है
शहरों में फैलती है
और फिर
सृष्टि की बनावट में
एक महीन कंपकंपी बन जाती है
एक अकेला मनुष्य
आकाश को देखता है
आकाश वही रहता है
पर उसका विस्तार
थोड़ा कम महसूस होता है
जैसे
किसी ने
नीले रंग में
थोड़ा-सा धूसर मिला दिया हो
हम सोचते हैं
कि अकेलापन
व्यक्ति की समस्या है
पर सच यह है
यह
सृष्टि का असंतुलन है
जब कोई
सच में अकेला होता है
तो पेड़
थोड़ा कम हरे लगते हैं
नदियाँ
थोड़ा कम बहती हुई
और हवा
जैसे
किसी अनजाने बोझ से
धीमी हो जाती है
लेकिन
हर दरार के भीतर
एक संभावना भी होती है
वहीं से
रोशनी भी आती है
और हवा भी
अगर एक मनुष्य
अपने अकेलेपन को
थोड़ा-सा साझा कर ले
तो
सृष्टि
धीरे-धीरे
अपने आप को
फिर से जोड़ने लगती है।
मुकेश ,,,,,,,
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