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Sunday, 19 April 2026

एक मनुष्य का अकेलापन

 एक मनुष्य का अकेलापन

पूरी सृष्टि की दरार है


यह बात

धीरे-धीरे समझ में आती है

जैसे किसी पुराने घर की दीवार

अचानक एक दिन

अपनी दरकन दिखा दे


वह अकेला बैठा होता है

भीड़ के बीच भी


उसके आसपास

आवाज़ें चलती रहती हैं

पर कोई आवाज़

उस तक नहीं पहुँचती


अकेलापन

कोई खाली जगह नहीं है


यह

एक भरी हुई चुप्पी है

जिसमें

कई अनकहे वाक्य

घुटते रहते हैं


जब एक मनुष्य

अंदर से टूटता है


तो उसकी दरार

सिर्फ उसी तक सीमित नहीं रहती


वह

धीरे-धीरे

रिश्तों में उतरती है

शहरों में फैलती है

और फिर


सृष्टि की बनावट में

एक महीन कंपकंपी बन जाती है


एक अकेला मनुष्य

आकाश को देखता है


आकाश वही रहता है

पर उसका विस्तार

थोड़ा कम महसूस होता है


जैसे

किसी ने

नीले रंग में

थोड़ा-सा धूसर मिला दिया हो


हम सोचते हैं

कि अकेलापन

व्यक्ति की समस्या है


पर सच यह है

यह

सृष्टि का असंतुलन है


जब कोई

सच में अकेला होता है


तो पेड़

थोड़ा कम हरे लगते हैं

नदियाँ

थोड़ा कम बहती हुई


और हवा

जैसे

किसी अनजाने बोझ से

धीमी हो जाती है


लेकिन


हर दरार के भीतर

एक संभावना भी होती है


वहीं से

रोशनी भी आती है

और हवा भी


अगर एक मनुष्य

अपने अकेलेपन को

थोड़ा-सा साझा कर ले


तो


सृष्टि

धीरे-धीरे

अपने आप को

फिर से जोड़ने लगती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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