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Sunday, 19 April 2026

विश्वास के टूटते ही

 विश्वास के टूटते ही

समय भी दरकने लगता है

धीरे-धीरे

जैसे काँच में

पहली महीन रेखा उतरती है


हम सोचते हैं

टूटा है सिर्फ भरोसा

पर सच यह है

टूटती है निरंतरता


कल

आज से अलग हो जाता है

और आज

कल से कोई रिश्ता नहीं रखता


घड़ी चलती रहती है

पर समय

वैसा नहीं रहता


उसकी चाल में

एक अनजानी रुकावट आ जाती है

जैसे हर सेकंड

किसी शक से गुज़र रहा हो


एक विश्वास

कई सालों में बनता है

और एक क्षण में

अपने ही भार से गिर पड़ता है


जब वह गिरता है

तो सिर्फ दिल नहीं टूटता

समय भी

टुकड़ों में बिखर जाता है


रिश्तों की स्मृतियाँ

अलग-अलग कोनों में

जमने लगती हैं


कोई हँसी

अब संदिग्ध लगती है

कोई बात

अब पूरी नहीं लगती


विश्वास

दरअसल समय की डोरी है


जिससे हम

अतीत को

वर्तमान से बाँधते हैं


और जैसे ही वह डोरी टूटती है

समय

अपने ही भीतर

बिखरने लगता है


तब


मनुष्य

सिर्फ आगे नहीं बढ़ता

वह

हर कदम पर

पीछे भी लौटता है


लेकिन


दरारें

हमेशा अंत नहीं होतीं


कभी-कभी

वहीं से

रोशनी भी भीतर आती है


और शायद


एक नया विश्वास

उसी दरकते हुए समय में

धीरे-धीरे

फिर से जन्म लेता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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