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Monday, 6 April 2026

ठहरने से पहले

 ठहरने से पहले

मैं भागता रहा

उत्तर की तरफ़,

सत्य की तरफ़,

अपने ही बनाए हुए किसी शिखर की तरफ़।


हर बार लगा

बस थोड़ा और…

और मैं पा लूँगा

वह अंतिम अर्थ

जिसके लिए यह सब घट रहा है।


रास्ते में

बहुत से “मैं” मिले

एक जो सफल होना चाहता था,

एक जो समझदार दिखना चाहता था,

एक जो बस

किसी की आँखों में टिक जाना चाहता था।


मैंने सबको

थोड़ा-थोड़ा जी लिया,

और हर बार

कुछ अधूरा रह गया।


फिर एक दिन

थककर

मैं रुक गया


ना ध्यान में,

ना प्रार्थना में,

बस

थकान में।


और उसी थकान में

कुछ गिरा


जैसे भीतर का कोई बोझ

बिना आवाज़ के

जमीन पर रख दिया गया हो।


मैंने देखा—

जब मैं नहीं भाग रहा था,

तो कुछ भी पीछे नहीं छूट रहा था।


जब मैं नहीं खोज रहा था,

तो कुछ भी खो नहीं रहा था।


तभी

एक बहुत साधारण सी बात

अचानक

गहरी हो गई


कि शायद

सत्य कहीं पहुँचने में नहीं,

बल्कि

रुक जाने में छिपा है।


अब

मैं फिर चलता हूँ

पर बिना मंज़िल के,


सोचता हूँ

पर बिना निष्कर्ष के,


जीता हूँ

पर बिना उस पकड़ के

जो हर चीज़ को “मेरा” बना लेती थी।


और हर कदम पर

ऐसा लगता है


जैसे कुछ घट नहीं रहा,

बल्कि

कुछ हट रहा है।


शायद

यही रास्ता है

जहाँ पहुँचने से पहले ही

तुम पहुँच चुके होते हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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