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Sunday, 5 April 2026

तुम और नीम की छाँव में ठहरा हुआ वक़्त

 तुम और नीम की छाँव में ठहरा हुआ वक़्त


तुम…

किसी कहानी की तरह नहीं आई थीं,

न ही किसी बड़े मोड़ की तरह

बस धीरे-धीरे

जैसे दोपहर उतरती है

और किसी नीम के नीचे

आकर बैठ जाती है।


तुम्हारे साथ

वक़्त चलता नहीं था,

ठहर जाता था


घड़ी चलती रहती,

पर भीतर

कुछ रुक जाता था,

जैसे किसी ने

दिन को pause कर दिया हो।


नीम की छाँव जैसी थीं तुम

पूरी तरह सुकून नहीं,

थोड़ी-सी कड़वाहट भी,

जो सच की तरह लगती थी।


तुम्हारी बातें

मीठी नहीं थीं,

पर सच्ची थीं

और शायद इसी वजह से

लंबे समय तक टिक जाती थीं।


हमारे बीच

बहुत कुछ कहा नहीं गया,

पर जो भी था

वो फैलता रहता था


जैसे छाँव

धीरे-धीरे सरकती है,

और तुम्हें पता भी नहीं चलता

कि तुम कब

धूप में आ गए।


एक दिन

तुम उठकर चली गईं


कोई शोर नहीं,

कोई वजह नहीं,

बस जैसे

नीम की छाँव

अचानक खिसक जाती है

और पेड़ वहीं रहता है।


अब मैं

उसी जगह बैठता हूँ कभी-कभी,

जहाँ हम थे


पर वहाँ

सिर्फ़ धूप होती है,

और एक आदत

जो अभी तक नहीं गई।


तुम्हारा होना

अब याद नहीं,

एक एहसास है


जैसे कभी यहाँ

ठंडक थी,

कभी यहाँ

वक़्त ठहरा था।


और अब…

वक़्त फिर से चल पड़ा है,

पर कुछ हिस्से

अब भी वहीं अटके हैं


नीम की छाँव में,

जहाँ तुम थीं,

और जहाँ

मैं आज भी

थोड़ी देर के लिए

रुक जाता हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,

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