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Sunday, 5 April 2026

उसकी हँसी और पोखर में गिरते पत्ते

 उसकी हँसी और पोखर में गिरते पत्ते


वो हँसती थी

जैसे किसी ने

एक शांत दोपहर में

अचानक एक पत्ता गिरा दिया हो

पोखर में।


हल्की-सी लहर,

एक गोल घेरा,

फिर…

सब कुछ वापस वैसा ही।


उसकी हँसी में

खुशी कम,

आदत ज़्यादा थी

जैसे किसी ने सिखाया हो

कि हर बात के बाद

थोड़ा हँस देना चाहिए।


ताकि

कोई गहराई

दिखाई न दे।


मैं कई बार

उसकी हँसी के बाद

रुककर देखता था


क्या कुछ और भी है वहाँ?


पर हर बार

बस वही शांत पानी मिलता,

जिसमें

लहरें जल्दी ही

खुद को समेट लेती थीं।


वो ज़ोर से नहीं हँसती थी,

न ही खुलकर

बस हल्का-सा

जैसे कोई संकेत,

कि “मैं ठीक हूँ…”


जबकि

उस “ठीक” के नीचे

कितना कुछ

डूबा हुआ था।


धीरे-धीरे

उसकी हँसी और हल्की होती गई—


जैसे अब

पत्ते भी

बहुत धीरे गिरते हों,

या शायद

गिरते ही न हों।


एक दिन

वो बिल्कुल नहीं हँसी।


कोई इमोजी नहीं,

कोई हल्की-सी आहट नहीं

बस सीधा वाक्य,

सीधा जवाब,

सीधी दूरी।


तब पहली बार लगा

शायद

हँसी ही

उसकी आख़िरी परत थी,

जो अब

उतर गई है।


अब जब

किसी पोखर के पास से गुजरता हूँ,

और कोई पत्ता गिरता है,


तो अनायास

उसकी याद आ जाती है


पर फर्क इतना है

कि अब

लहरें नहीं बनतीं,


बस

पानी थोड़ी देर के लिए

और गहरा लगने लगता है।


और वो…

शायद अब भी कहीं है,

पर उसकी हँसी

अब किसी पोखर में नहीं गिरती


वो

किसी सूखे पेड़ पर

अटकी रह गई है,

जहाँ से

अब कुछ भी नहीं टूटता।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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