सर्वात्मभाव से द्वेष-निवृत्ति — “न विजुगुप्सते” का शांकरार्थ
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
**इत्यर्थः। सर्वभूतेषु तेष्वेव च आत्मानं, तेषामपि भूतानां स्वम् आत्मानम् आत्मत्वेन—
यथा अस्य देहस्य काय-करण-संघातस्य आत्मा अयं सर्वप्रत्यय-साक्षिभूतः चेतयिता केवलः निर्गुणः,
अनेनैव स्वरूपेण अव्यक्तादीनां स्थावरान्तानाम् अहमेव आत्मा इति सर्वभूतेषु च आत्मानं निवेश्य,
यः तु अनुपश्यति स ततः तस्मादेव दर्शनात् न विजुगुप्सते—विजुगुप्सां घृणां न करोति।
प्रपञ्चस्य एव अनुबन्धः अयम्। सर्वा हि घृणा आत्मनः अन्यत् दुष्टं पश्यतः भवति;
आत्मानम् एव अत्यन्तविशुद्धं निरन्तरं पश्यतः न घृणा अस्ति॥**
जो व्यक्ति सभी प्राणियों में उसी आत्मा को देखता है, और उन सभी प्राणियों को अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में अनुभव करता है
जैसे इस शरीर में एक ही साक्षी आत्मा है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् में वही आत्मा “मैं” हूँ
ऐसा जो अनुभव करता है, वह किसी से घृणा नहीं करता।
क्योंकि घृणा तभी उत्पन्न होती है जब हम किसी को अपने से भिन्न और दूषित मानते हैं।
परन्तु जो सबमें एक ही शुद्ध आत्मा को देखता है, उसमें घृणा का स्थान नहीं रहता।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के षष्ठ मन्त्र के शांकरभाष्य का अगला भाग है, जिसमें “न विजुगुप्सते” पद का गहन अर्थ स्पष्ट किया गया है। यहाँ शंकराचार्य यह बताते हैं कि आत्मज्ञान का प्रत्यक्ष फल क्या है—द्वेष और घृणा का पूर्ण अभाव।
प्रारम्भ में यह प्रतिपादित किया गया है कि ज्ञानी पुरुष केवल इतना ही नहीं देखता कि “सभी भूत आत्मा में हैं”, बल्कि वह यह भी अनुभव करता है कि
“मैं ही उन सबका आत्मा हूँ”।
यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म परिवर्तन है
पहले चरण में “सब मुझमें हैं” का भाव था,
अब “मैं सबमें हूँ” और “मैं ही सबका आत्मा हूँ”—यह पूर्ण अद्वैत अनुभूति है।
शंकराचार्य इसे स्पष्ट करने के लिए एक सुंदर दृष्टांत देते हैं
जैसे इस शरीर में अनेक अंग (हाथ, पैर, इन्द्रियाँ) हैं, परंतु उनका साक्षी और चेतयिता एक ही आत्मा है,
वैसे ही सम्पूर्ण जगत्—अव्यक्त से लेकर स्थावर तक—सबमें एक ही आत्मा विद्यमान है।
“सर्वप्रत्यय-साक्षिभूतः”—आत्मा सभी अनुभवों का साक्षी है।
वह न शरीर है, न मन, न बुद्धि—बल्कि वह इन सबका जानने वाला, शुद्ध चेतना है।
जब ज्ञानी इस आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप के रूप में जान लेता है, तब वह देखता है—
“अहमेव आत्मा”—मैं ही सबका आत्मा हूँ।
अब इस ज्ञान का स्वाभाविक फल बताया गया है—
“न विजुगुप्सते”—वह किसी से घृणा नहीं करता।
क्यों?
क्योंकि घृणा (विजुगुप्सा) का मूल कारण है—भेदभाव।
जब हम किसी को “दूसरा” मानते हैं, और उसमें कोई दोष देखते हैं, तब घृणा उत्पन्न होती है।
शंकराचार्य स्पष्ट कहते हैं—
“सर्वा हि घृणा आत्मनः अन्यत् दुष्टं पश्यतः भवति”—
घृणा तब होती है जब हम किसी को अपने से भिन्न और दूषित मानते हैं।
परंतु ज्ञानी के लिए ऐसा कोई “अन्य” नहीं है।
वह सबमें एक ही शुद्ध, निरन्तर, अविकार आत्मा को देखता है—
“आत्मानम् एव अत्यन्तविशुद्धं निरन्तरं पश्यतः”।
इसलिए उसमें घृणा का कोई कारण ही नहीं रहता।
यह केवल नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि ज्ञान का स्वाभाविक परिणाम है।
ज्ञानी को अलग से “अहिंसा” या “प्रेम” का अभ्यास नहीं करना पड़ता
उसका ज्ञान ही उसे समदर्शी और करुणामय बना देता है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
कोई व्यक्ति अपने ही शरीर के किसी अंग से घृणा नहीं करता, चाहे वह अंग बीमार ही क्यों न हो।
क्योंकि वह उसे “स्वयं” मानता है।
इसी प्रकार, ज्ञानी सम्पूर्ण जगत् को अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में देखता है, इसलिए उसमें किसी के प्रति द्वेष नहीं रहता।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने स्पष्ट किया है कि सर्वात्मभाव का प्रत्यक्ष फल घृणा और द्वेष का पूर्ण अभाव है। जो साधक सभी प्राणियों में अपने ही आत्मा का दर्शन करता है, उसके लिए कोई “अन्य” नहीं रहता, और इसलिए वह किसी से घृणा नहीं करता। इस प्रकार, आत्मज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आचरण में भी शुद्धता, समता और करुणा का स्रोत बनता है—यही अद्वैत वेदान्त की जीवन-दृष्टि है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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