होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Friday, 17 April 2026

न विजुगुप्सते” का अभिप्राय — भेददृष्टि के अभाव से घृणा-निवृत्ति

 न विजुगुप्सते” का अभिप्राय — भेददृष्टि के अभाव से घृणा-निवृत्ति

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

मिथ्या अर्थान्तरम् अस्ति इति प्राप्तम् एव; ततः न विजुगुप्सते इति।

जब यह समझ लिया जाता है कि आत्मा से भिन्न कोई अन्य वस्तु (अर्थान्तर) वास्तव में नहीं है (केवल मिथ्या है), तब वह किसी से घृणा नहीं करता।


यह संक्षिप्त किन्तु अत्यंत गूढ़ भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के षष्ठ मन्त्र में आए “न विजुगुप्सते” पद के अंतिम दार्शनिक आधार को प्रस्तुत करता है। यहाँ शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानी पुरुष में घृणा का अभाव केवल नैतिकता का परिणाम नहीं, बल्कि तत्त्वज्ञान का अनिवार्य निष्कर्ष है।

“मिथ्या अर्थान्तरम् अस्ति”—यहाँ “अर्थान्तर” का अर्थ है आत्मा से भिन्न कोई अन्य सत्ता।

अविद्या के कारण हमें यह प्रतीत होता है कि संसार में अनेक स्वतंत्र वस्तुएँ हैं—मैं अलग हूँ, अन्य प्राणी अलग हैं, वस्तुएँ अलग हैं।

परंतु शंकराचार्य के अनुसार यह भेद मिथ्या (अविद्याजन्य) है, न कि वास्तविक।

जब साधक आत्मज्ञान के द्वारा यह जान लेता है कि,

आत्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र सत्ता नहीं है,

तब “अन्य” का विचार ही समाप्त हो जाता है।


अब घृणा (विजुगुप्सा) की उत्पत्ति का कारण समझना आवश्यक है

घृणा तब उत्पन्न होती है जब हम किसी को “दूसरा” मानते हैं और उसमें दोष देखते हैं।

यदि “दूसरा” ही नहीं रहा, तो घृणा का आधार भी समाप्त हो जाता है।


इसलिए कहा गया—“ततः न विजुगुप्सते”

उस ज्ञान के कारण वह किसी से घृणा नहीं करता।


यहाँ शंकराचार्य का अभिप्राय अत्यंत सूक्ष्म है

घृणा का अभाव कोई अलग से साधना नहीं, बल्कि अद्वैत ज्ञान का स्वाभाविक फल है।


जब ज्ञानी यह अनुभव करता है कि

“सर्वं खल्विदं ब्रह्म” और “अहमेव सर्वस्य आत्मा”

तब वह किसी को अपने से भिन्न नहीं देखता।

इस अवस्था में द्वेष, राग, भय—ये सभी स्वतः लुप्त हो जाते हैं।


एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है

स्वप्न में हम अनेक व्यक्तियों से मिलते हैं—कुछ प्रिय, कुछ अप्रिय।

परंतु जागने पर ज्ञात होता है कि वे सभी हमारे ही मन के रूप थे।

तब उन सबके प्रति कोई घृणा नहीं रहती, क्योंकि वे “अन्य” नहीं थे।


इसी प्रकार, आत्मज्ञान होने पर ज्ञानी समझता है कि यह सम्पूर्ण जगत् उसी आत्मा का ही प्रपंच है—

अतः किसी से घृणा करने का प्रश्न ही नहीं उठता।

इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि जब साधक यह जान लेता है कि आत्मा से भिन्न कोई अन्य सत्ता वास्तव में नहीं है, तब घृणा का कारण ही समाप्त हो जाता है। “न विजुगुप्सते” का तात्पर्य यही है कि अद्वैत ज्ञान के फलस्वरूप ज्ञानी में द्वेष और भेदभाव का पूर्ण अभाव हो जाता है। यही आत्मज्ञान की चरम परिणति है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment