मोह-शोक का अभाव और सर्वात्मदर्शन — “को मोहः कः शोकः” का शांकरार्थ
परमार्थतः आत्मैव इदं सर्वम् आत्मैव संवृतम् इति विजानतः।
तत्र—तस्मिन् काले, तस्मिन् आत्मनि वा—को मोहः? कः शोकः?
शोकश्च मोहश्च कामकर्मबीजम् अज्ञानवतः भवति, न तु आत्मैकत्वदर्शनं पश्यतः।
जो ज्ञानी यह जान लेता है कि वास्तव में यह सम्पूर्ण जगत् आत्मा ही है, उसी से आवृत है—
उसके लिए उस अवस्था में या उस आत्मा में कोई मोह या शोक नहीं रहता।
क्योंकि मोह और शोक अज्ञानियों के लिए होते हैं, जो कामना और कर्म के कारण उत्पन्न होते हैं;
परन्तु जो आत्मा की एकता को देखता है, उसके लिए ये नहीं होते।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के सप्तम मन्त्र—“को मोहः कः शोकः”—का गहन अद्वैतार्थ प्रस्तुत करता है। यहाँ शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि आत्मज्ञान का परम फल क्या है—मोह और शोक का पूर्ण अभाव।
प्रथम वाक्य—“परमार्थतः आत्मैव इदं सर्वम्”—अद्वैत का मूल सिद्धांत है।
यह सम्पूर्ण जगत्, जो हमें विविध और भिन्न प्रतीत होता है, वास्तव में आत्मा ही है।
“संवृतम्”—अर्थात् उसी आत्मा से आच्छादित है, उसी में स्थित है।
जब साधक इस सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान (विज्ञान) प्राप्त कर लेता है—
तब उसकी दृष्टि में कोई भेद नहीं रहता।
अब वह न स्वयं को शरीर मानता है, न अन्य को भिन्न जीव।
अब प्रश्न उठता है,
“को मोहः? कः शोकः?”
उस अवस्था में मोह और शोक का क्या स्थान?
शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं
मोह (delusion) और शोक (sorrow) दोनों का मूल कारण है—अज्ञान (अविद्या)।
अज्ञान के कारण ही मनुष्य स्वयं को सीमित शरीर मानता है,
और अन्य वस्तुओं को अपने से भिन्न।
इस भेदभाव से ही कामना (desire) उत्पन्न होती है,
और कामना से कर्म (action),
और कर्म से सुख-दुःख, हानि-लाभ, शोक-मोह आदि।
इसलिए कहा गया
“शोकश्च मोहश्च कामकर्मबीजम् अज्ञानवतः भवति”—
मोह और शोक अज्ञानियों के लिए होते हैं, और उनका मूल कारण कामना और कर्म हैं।
परन्तु जब आत्मज्ञान होता है—
जब साधक यह देखता है कि “सर्वं आत्मा एव”—
तब “अन्य” का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
अब न किसी को पाने की इच्छा रहती है,
न किसी के खोने का भय।
न राग, न द्वेष—
और इसलिए न मोह, न शोक।
यहाँ शंकराचार्य का अभिप्राय अत्यंत स्पष्ट है—
मोह और शोक का नाश किसी बाह्य उपाय से नहीं, बल्कि केवल आत्मज्ञान से ही संभव है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
स्वप्न में व्यक्ति अनेक दुःखों का अनुभव करता है—हानि, भय, शोक।
परंतु जागने पर यह सब समाप्त हो जाता है, क्योंकि वह जान जाता है कि यह सब मिथ्या था।
इसी प्रकार, आत्मज्ञान रूपी “जागरण” से संसारजन्य मोह और शोक समाप्त हो जाते हैं।
यह केवल दार्शनिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि जीवन की परम शांति का आधार है।
निष्कर्ष
इस भाष्यांश में शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि जब साधक यह जान लेता है कि सम्पूर्ण जगत् आत्मा ही है, तब उसके लिए मोह और शोक का कोई स्थान नहीं रहता। ये दोनों केवल अज्ञान और कामना से उत्पन्न होते हैं। आत्मैकत्वदर्शन से इनका पूर्ण नाश हो जाता है—यही अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि और जीवन की परम शांति है।
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