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Thursday, 23 April 2026

अनकहे का रिश्ता

 अनकहे का रिश्ता


कुछ रिश्ते

शब्दों से नहीं बनते

वे चुप्पियों के बीच

धीरे-धीरे जन्म लेते हैं।

तुमने कभी कहा नहीं,

मैंने कभी पूछा नहीं

फिर भी

कुछ था

जो हमारे बीच ठहरता रहा।

न वादे,

न इज़हार,

न कोई नाम—

बस एक एहसास

जो हर मुलाक़ात के बाद

और गहरा हो जाता था।

कभी तुम्हारी आँखों में

एक अधूरा-सा वाक्य दिखता,

कभी मेरी ख़ामोशी

तुम्हारा जवाब बन जाती।

यह कैसा रिश्ता था

जहाँ बात कम,

समझ ज़्यादा थी।

अब तुम नहीं हो,

और वो बातें भी नहीं

जो कभी हुई ही नहीं

फिर भी

यह रिश्ता टूटा नहीं।

क्योंकि

जो कहा नहीं गया,

वो खोता भी नहीं

वह कहीं भीतर

वैसा ही रह जाता है।

अनकहे का यह रिश्ता

शायद सबसे सच्चा होता है—

क्योंकि इसमें

कोई झूठ नहीं होता,

कोई बनावट नहीं।

सिर्फ़ एक ख़ामोशी होती है

जो दो लोगों के बीच

धीरे-धीरे

प्रेम बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

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