तुम्हारी याददाश्त—रंगों की अलमारी

 तुम्हारी याददाश्त—रंगों की अलमारी


मैं

तुम्हारी याददाश्त का कायल हूँ…

तुम्हें आज भी याद है—

बरसों पहले

किस फंक्शन में मैंने

कौन-सी शर्ट पहनी थी,

किस शादी में

कौन-सा सूट।

और मुझे

मुझे तो ये भी याद नहीं रहता

कि कल क्या पहना था।

मुझे बस इतना याद है

जेब में वही गन्दा रुमाल था,

और तुम

बड़बड़ाते हुए

अलमारी से नया रुमाल ले आई थीं,

जैसे मेरी आदतों पर

तुम्हारा एक छोटा-सा अधिकार हो।

तुम्हें ये भी याद रहता है

मैंने कब, कहाँ

तुम्हारी किस सहेली से

दो बातें ज़्यादा कर ली थीं,

और तुम

बनावटी गुस्से में

थोड़ी-सी सचमुच की चुप्पी

ओढ़ लेती थीं…

ये सब

बहुत पहले की बातें हैं

पर तुम्हारे लिए

समय रुकता नहीं,

बस तह लगाकर

रख दिया जाता है कहीं।

तुम्हें

सिर्फ मेरी नहीं

अपनी सहेलियों की भी

हर ड्रेस याद रहती है

किसने कौन-सी साड़ी पहनी थी,

कौन-सा सलवार सूट,

कौन उसमें खिल रही थी,

और कौन

बस “अच्छा दिखने” की कोशिश में

थोड़ी-सी खो गई थी।

तुम

लोगों को

उनके कपड़ों में नहीं,

उनके चुनावों में पढ़ती हो

रंगों के पीछे छुपे

मन के छोटे-छोटे संकेत।

और मैं

मैं तुम्हें पढ़ता हूँ,

तुम्हारी इस याददाश्त में…

जहाँ हर रंग,

हर कपड़ा,

हर छोटी-सी बात

अब भी सुरक्षित है

जैसे

तुमने

हमारे बीच के समय को

कभी बीतने ही नहीं दिया…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

Comments

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 29 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
    अथ स्वागतम शुभ स्वागतम

    ReplyDelete

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