जब प्रश्न मरते हैं
उत्तर भी अनाथ हो जाते हैं
धीरे-धीरे
जैसे किसी घर से
आवाज़ें उठना बंद हो जाएँ
हम सवाल करना छोड़ देते हैं
क्योंकि
या तो हमें डर लगता है
या हमें यक़ीन हो जाता है
कि सब पता है
दोनों ही स्थितियों में
कुछ मरता है भीतर
प्रश्न
सिर्फ जिज्ञासा नहीं होते
वे रास्ते होते हैं
जिनसे होकर
हम अपने ही भीतर पहुँचते हैं
जब वे रास्ते बंद हो जाते हैं
तो उत्तर
दरवाज़ों पर खड़े रह जाते हैं
बिना किसी के
जो उन्हें खोले
या सुने
उत्तर
तब भी होते हैं
लेकिन वे
अपनी चमक खो देते हैं
जैसे दीपक
बिना किसी आँख के
सिर्फ जलता रह जाए
एक समाज
जब सवाल करना छोड़ देता है
तो वह
उत्तर से भर जाता है
और फिर भी
खाली हो जाता है
क्योंकि
उत्तर
अपने आप में पूर्ण नहीं होते
उन्हें अर्थ मिलता है
सिर्फ प्रश्नों से
जब प्रश्न मरते हैं
तो ज्ञान
सूचना बन जाता है
और सूचना
धीरे-धीरे
शोर में बदल जाती है
लेकिन
हर चुप्पी के भीतर
एक बहुत हल्का कंपन होता है
वही
पहला प्रश्न होता है
और जैसे ही
कोई एक मनुष्य
फिर से पूछता है—
“क्यों?”
उसी क्षण
कई अनाथ उत्तर
अपने घर लौटने लगते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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