विद्या–अविद्या के फलों की भिन्नता — दशम मन्त्र के शांकरभाष्य का प्रथम पद
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
अन्यत् — एतदेव विद्यया क्रियते फलम् इति आहुः।
“विद्यया देवलोकः”, “विद्यया तद् आरोहन्ति” इति श्रुतेः।
अन्यत् आहुः अविद्यया — कर्मणा क्रियते।
“कर्मणा पितृलोकः” इति श्रुतेः।
ईशावास्योपनिषद् के दशम मन्त्र में जहाँ नवम मन्त्र की प्रतीत होने वाली विरोधाभासी शिक्षा का समाधान प्रस्तुत किया गया है, वहीं आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में “अन्यत्” शब्द के माध्यम से एक अत्यन्त सूक्ष्म और निर्णायक भेद स्थापित करते हैं। यह भेद केवल दो साधनों का नहीं, बल्कि उनके फलों की प्रकृति, दिशा और सीमा का है।
नवम मन्त्र में जहाँ यह कहा गया था कि केवल कर्म और केवल उपासना—दोनों ही अन्धकार का कारण बन सकते हैं, वहाँ दशम मन्त्र यह स्पष्ट करता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों के फल भिन्न हैं और दोनों ही अंतिम सत्य नहीं हैं।
“अन्यत्” — फल-भेद का उद्घाटन
शंकराचार्य “अन्यत्” शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं—
“एतदेव विद्यया क्रियते फलम्”
अर्थात्, विद्या से जो फल उत्पन्न होता है, वह विशिष्ट है—
और वह अविद्या (कर्म) से उत्पन्न फल से सर्वथा भिन्न है।
यहाँ “अन्यत्” का अभिप्राय यह है कि—
विद्या और अविद्या का भेद केवल साधन का नहीं,
बल्कि उनके परिणामों की गुणात्मक (qualitative) भिन्नता का है।
विद्या का फल — देवयान की उर्ध्वगति
शंकराचार्य श्रुति का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—
“विद्यया देवलोकः”
“विद्यया तद् आरोहन्ति”
अर्थात्, उपासना (विद्या) के द्वारा साधक देवलोक को प्राप्त होता है और उस उच्चतर अवस्था को “आरोहण” करता है।
यहाँ विद्या का स्वरूप है—
देवता-चिन्तन
ध्यान
ईश्वर के सगुण रूप की उपासना
इस साधना का फल—
ऊर्ध्वगति (ऊपर की ओर उन्नति)
सूक्ष्म लोकों की प्राप्ति
प्रकाशमय चेतना
किन्तु, यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु है—
- यह अभी भी द्वैत के भीतर है
- उपासक और उपास्य का भेद बना रहता है
अतः, यह उच्चतर होते हुए भी अंतिम नहीं है।
अविद्या का फल — कर्ममार्ग की सीमित परिधि
इसके विपरीत, शंकराचार्य कहते हैं—
“अन्यदाहुः अविद्यया — कर्मणा क्रियते”
और श्रुति का प्रमाण देते हैं—
“कर्मणा पितृलोकः”
अर्थात्, कर्म (अविद्या) के द्वारा साधक पितृलोक को प्राप्त होता है।
यहाँ अविद्या का स्वरूप है—
यज्ञ
दान
वैदिक कर्मकाण्ड
इसका फल—
पुण्य
पितृलोक या स्वर्ग
किन्तु पुनः संसार में वापसी
यह मार्ग—
- चक्रात्मक (cyclical) है
- उन्नति देता है, परन्तु मुक्ति नहीं
“अन्यत्” द्वारा स्थापित गहन दार्शनिक सत्य
इस प्रकार “अन्यत्” शब्द यह सिद्ध करता है कि—
विद्या (उपासना) → देवयान → ऊर्ध्वगति
अविद्या (कर्म) → पितृयान → पुनरावृत्ति
यह भेद केवल स्तर का नहीं, बल्कि दिशा का है—
एक ऊपर उठाता है
दूसरा चक्र में घुमाता है
किन्तु दोनों ही—
- अज्ञान के क्षेत्र में आते हैं
- क्योंकि दोनों में आत्मज्ञान का अभाव है
सूक्ष्म संकेत — समुच्चय की आवश्यकता
यहाँ शंकराचार्य का उद्देश्य केवल भेद स्थापित करना नहीं है।
बल्कि यह दिखाना है कि—
- जब तक साधक इन दोनों के फलों की सीमाओं को नहीं समझता,
- तब तक वह किसी एक में आसक्त होकर रुक जाएगा।
इसीलिए—
कर्म को ही सब कुछ मानना → बन्धन
उपासना को ही अंतिम मानना → सूक्ष्म बन्धन
अतः यह भेद आगे चलकर (अगले मन्त्र में) समुच्चय की आवश्यकता को सिद्ध करता है।
गहन दृष्टांत
जैसे—
कोई व्यक्ति सीढ़ी के एक पायदान को ही अंतिम मंज़िल समझ ले,
तो वह ऊपर नहीं पहुँच सकता।
उसी प्रकार—
कर्म एक पायदान है
उपासना दूसरा पायदान
परन्तु लक्ष्य इन दोनों से परे है।
निष्कर्ष
इस भाष्यांश में आदि शंकराचार्य “अन्यत्” शब्द के माध्यम से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त स्थापित करते हैं कि विद्या और अविद्या के फल परस्पर भिन्न हैं— एक देवयान की ओर ले जाता है, दूसरा पितृयान की ओर।
किन्तु दोनों ही अभी अंतिम सत्य नहीं हैं।
अतः उपनिषद् का गूढ़ अभिप्राय यह है कि—
साधक इन दोनों के भेद को समझे, उनकी सीमाओं को जाने, और अंततः उस ज्ञान की ओर अग्रसर हो जो इन दोनों से परे है।
यही बोध उसे क्रमशः समुच्चय, और अन्ततः आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
मुकेश ,,,,,
No comments:
Post a Comment