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Sunday, 19 April 2026

ईशावास्योपनिषद् – दशम मन्त्र का समुच्चय-परक निबंधात्मक विवेचन

 ईशावास्योपनिषद् – दशम मन्त्र का समुच्चय-परक निबंधात्मक विवेचन

अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।

इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१०॥

अन्वय

धीराणाम् ये नः तत् विचचक्षिरे, तेभ्यः इति शुश्रुम

विद्यया अन्यत् एव आहुः, अविद्यया अन्यत् आहुः।

सामान्य अर्थ

जिन धीर पुरुषों ने हमें इस तत्त्व का उपदेश किया है, उनसे हमने यह सुना है कि विद्या (उपासना) से जो फल प्राप्त होता है, वह भिन्न है; और अविद्या (कर्म) से जो फल प्राप्त होता है, वह उससे भिन्न है।

ईशावास्योपनिषद् का यह दशम मन्त्र अपने पूर्ववर्ती नवम मन्त्र से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। नवम मन्त्र में यह प्रतिपादित किया गया था कि जो केवल अविद्या अर्थात् कर्म में प्रवृत्त रहते हैं, वे अन्धकार में प्रवेश करते हैं; और जो केवल विद्या अर्थात् उपासना में ही आसक्त रहते हैं, वे उससे भी अधिक गहन अन्धकार में गिरते हैं। इस कथन से साधक के मन में स्वाभाविक रूप से यह शंका उत्पन्न होती है कि यदि कर्म और उपासना दोनों ही अन्धकार का कारण बनते हैं, तो साधना का यथार्थ मार्ग क्या है।

इसी शंका का समाधान प्रस्तुत करते हुए यह दशम मन्त्र कहता है कि विद्या और अविद्या के फल परस्पर भिन्न हैं। यहाँ “अविद्या” का अभिप्राय अज्ञान न होकर वैदिक कर्म, यज्ञ, दान आदि क्रियात्मक साधनों से है, जबकि “विद्या” का तात्पर्य देवता-उपासना, ध्यान और आध्यात्मिक साधना से है। यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि इन दोनों साधनों के परिणाम एक समान नहीं हैं, बल्कि वे अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग प्रकार के फल प्रदान करते हैं।

कर्म का फल सीमित और लौकिक है— वह साधक को पुण्य, स्वर्ग और पुनर्जन्म के चक्र में रखता है। दूसरी ओर, उपासना का फल अपेक्षाकृत उच्चतर है— वह साधक को सूक्ष्म लोकों अथवा देवताओं की स्थिति तक ले जाती है; किन्तु यह भी अंतिम मुक्ति का साधन नहीं है। इस प्रकार, दोनों ही मार्ग अपने-अपने स्तर पर उपयोगी होते हुए भी अपूर्ण हैं।

यहीं पर इस मन्त्र का गूढ़ संकेत निहित है— कि इन दोनों का समुच्चय ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। केवल कर्म करने से चित्त शुद्ध तो होता है, किन्तु स्थिरता और एकाग्रता का अभाव बना रहता है; और केवल उपासना करने से मन एकाग्र तो होता है, परन्तु यदि चित्त शुद्ध न हो, तो सूक्ष्म अहंकार उत्पन्न हो सकता है। अतः जब कर्म और उपासना का समन्वय किया जाता है, तब साधक का चित्त शुद्ध भी होता है और एकाग्र भी, जिससे वह उच्चतर ज्ञान के लिए पात्र बनता है।

“धीराणाम्” शब्द इस सन्दर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाता है कि यह शिक्षा केवल सैद्धान्तिक नहीं, बल्कि अनुभूत सत्य है, जिसे ज्ञानी पुरुषों ने अपने अनुभव से प्रतिपादित किया है। आदि शंकराचार्य के अनुसार, यह समुच्चय प्रत्यक्ष मोक्ष का साधन नहीं, बल्कि मोक्ष के लिए आवश्यक पात्रता उत्पन्न करता है।

अतः, इस मन्त्र का निष्कर्ष यह है कि साधना-पथ में एकांगी दृष्टिकोण उचित नहीं है। कर्म और उपासना दोनों के भिन्न-भिन्न फलों को समझते हुए, उनका समुचित समन्वय करना ही साधक के लिए उन्नति का मार्ग है। नवम मन्त्र जहाँ उनके पृथक्करण के दोष को दर्शाता है, वहीं यह दशम मन्त्र उनके यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट कर समुच्चय की दिशा में साधक को अग्रसर करता है। अंततः यही समन्वित साधना साधक को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के योग्य बनाती है, जो वास्तविक मुक्ति का द्वार है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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