स्वरूप-निरूपण की ओर संक्रमण — अष्टम मन्त्र की शांकरभाष्य-भूमिका
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
यः अयम् अतीते मन्त्रे उक्तः आत्मा, स स्वेन रूपेण निरूप्यते इति आह अयं मन्त्रः॥
सरल हिंदी अर्थ
जो आत्मा पूर्व मन्त्रों में बताया गया है, उसी का अब अपने वास्तविक स्वरूप में वर्णन किया जाएगा—ऐसा यह मन्त्र कहता है।
यह अंश ईशावास्योपनिषद् के अष्टम मन्त्र के शांकरभाष्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। यहाँ शंकराचार्य उपनिषद् के प्रवाह को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि अब तक जिस आत्मा का वर्णन विभिन्न दृष्टियों से किया गया था, उसी का अब उसके शुद्ध, वास्तविक स्वरूप में प्रत्यक्ष निरूपण किया जाएगा।
“यः अयम् अतीते मन्त्रे उक्तः आत्मा”—इस वाक्य में “अतीते मन्त्रे” से अभिप्राय है पूर्ववर्ती मन्त्र—विशेषतः षष्ठ और सप्तम मन्त्र, जिनमें आत्मा का वर्णन सर्वात्मभाव के रूप में किया गया था। वहाँ यह बताया गया कि ज्ञानी सभी भूतों को आत्मा में देखता है और आत्मा से भिन्न कुछ नहीं मानता; फलस्वरूप उसमें मोह और शोक का अभाव हो जाता है।
किन्तु उन मन्त्रों में आत्मा का स्वरूप मुख्यतः व्यवहारिक दृष्टि (experiential standpoint) से बताया गया था—अर्थात् उसके फल (जैसे शोक-मोह का अभाव) के माध्यम से।
अब शंकराचार्य कहते हैं—“स स्वेन रूपेण निरूप्यते”—
अर्थात् वही आत्मा अब अपने निजस्वरूप (essential nature) में प्रतिपादित किया जाएगा।
यहाँ “स्वेन रूपेण” अत्यंत महत्वपूर्ण पद है।
इसका अर्थ है—आत्मा का वह स्वरूप जो किसी भी उपाधि (शरीर, मन, इन्द्रियाँ) से रहित है;
जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और निरुपाधिक है।
अद्वैत वेदान्त की शिक्षण-पद्धति में यह एक आवश्यक चरण है
पहले आत्मा को जगत् के साथ संबंध में समझाया जाता है (जैसे “सर्वभूतस्थ आत्मा”)
फिर उसी आत्मा को उसके शुद्ध, स्वतंत्र स्वरूप में प्रकट किया जाता है
अष्टम मन्त्र इसी दूसरे चरण का प्रारम्भ है।
इस भूमिका का उद्देश्य साधक को यह संकेत देना है कि
अब तक जो कुछ कहा गया, वह आत्मा के प्रभाव और अनुभूति के विषय में था;
अब आगे जो कहा जाएगा, वह आत्मा के स्वरूप (ontology) का प्रत्यक्ष वर्णन होगा।
यह परिवर्तन अत्यंत सूक्ष्म है, परन्तु दार्शनिक दृष्टि से अत्यंत गहरा
अब चर्चा “आत्मा क्या करता है” या “उसका क्या फल है” से हटकर “आत्मा क्या है” पर केन्द्रित होती है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे पहले किसी व्यक्ति के गुण, कार्य और प्रभाव बताए जाएँ, और फिर अंत में उसका वास्तविक परिचय दिया जाए
वैसे ही यहाँ आत्मा के प्रभाव (सर्वात्मभाव, शोक-मोह का अभाव) के बाद अब उसका वास्तविक स्वरूप बताया जा रहा है।
इस प्रकार, यह भूमिका साधक को तैयार करती है कि वह अब उपाधियों से परे, शुद्ध चैतन्यस्वरूप ब्रह्म को समझने के लिए सजग हो जाए।
इस भाष्य-भूमिका में शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि पूर्व मन्त्रों में जिस आत्मा का वर्णन किया गया था, अब उसी का उसके शुद्ध, निरुपाधिक स्वरूप में प्रतिपादन किया जाएगा। यह अद्वैत वेदान्त की शिक्षण-पद्धति का महत्वपूर्ण चरण है, जहाँ साधक अनुभवात्मक समझ से आगे बढ़कर तत्त्व के प्रत्यक्ष स्वरूप की ओर अग्रसर होता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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