मोह–शोक के अभाव से संसार-निवृत्ति — सप्तम मन्त्र का शांकरार्थ
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
“को मोहः कः शोकः” इति शोक-मोहयोः अविद्याकामयोः आक्षेपेण असम्भव-प्रदर्शनात्,
सकारणस्य संसारस्य अत्यन्तम् उच्छेदः प्रदर्शितो भवति॥७॥
“कौन-सा मोह और कौन-सा शोक?”—इस प्रकार शोक और मोह (जो अविद्या और कामना से उत्पन्न होते हैं) के निषेध के द्वारा उनके असंभव होने को दिखाया गया है।
इससे कारण सहित संसार का पूर्णतः नाश (उच्छेद) सिद्ध होता है।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के सप्तम मन्त्र—“को मोहः कः शोकः”—का अंतिम दार्शनिक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। यहाँ शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि यह केवल एक भावात्मक प्रश्न नहीं है, बल्कि अद्वैत सिद्धान्त का निर्णायक प्रतिपादन है।
“को मोहः कः शोकः”—यह प्रश्न वास्तव में निषेध (negation) का रूप है।
अर्थात् उस ज्ञानी के लिए, जिसने आत्मा की एकता का साक्षात्कार कर लिया है, मोह और शोक का अस्तित्व ही नहीं है।
अब शंकराचार्य इन दोनों—मोह और शोक—के कारणों की ओर संकेत करते हैं—
“अविद्याकामयोः”—
मोह का मूल कारण है अविद्या (अज्ञान)
शोक का मूल कारण है कामना (इच्छा)
जब मनुष्य स्वयं को सीमित शरीर मानता है (अविद्या),
तब वह अन्य वस्तुओं को पाने की इच्छा करता है (कामना)।
और जब वह इच्छा पूर्ण नहीं होती, या प्राप्त वस्तु का नाश होता है, तब शोक उत्पन्न होता है।
इस प्रकार, यह एक श्रृंखला है
अविद्या → कामना → कर्म → शोक-मोह → संसार
अब शंकराचार्य कहते हैं—
“आक्षेपेण असम्भव-प्रदर्शनात्”—
यहाँ “को मोहः कः शोकः” कहकर इनका अस्तित्व ही असंभव सिद्ध किया गया है—ज्ञानी के लिए।
जब कारण (अविद्या और कामना) ही नष्ट हो जाते हैं,
तो उनके परिणाम (मोह और शोक) भी स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
इसी से अगला महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—
“सकारणस्य संसारस्य अत्यन्तम् उच्छेदः”
अर्थात् कारण सहित संसार का पूर्णतः नाश।
यहाँ “संसार” का अर्थ केवल बाह्य जगत् नहीं, बल्कि जन्म-मरण का चक्र, दुःख, बंधन—इन सबका समूह है।
और “सकारणस्य” का अर्थ है—उसके कारण सहित।
शंकराचार्य का अभिप्राय है कि
आत्मज्ञान केवल लक्षणात्मक परिवर्तन नहीं करता, बल्कि बंधन की जड़ (अविद्या) को ही उखाड़ देता है।
जब जड़ ही नष्ट हो जाती है, तो वृक्ष (संसार) भी समाप्त हो जाता है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
यदि किसी वृक्ष की केवल शाखाएँ काट दी जाएँ, तो वह फिर उग सकता है;
परंतु यदि उसकी जड़ ही उखाड़ दी जाए, तो उसका पूर्ण नाश हो जाता है।
इसी प्रकार, आत्मज्ञान अविद्या रूपी जड़ को नष्ट कर देता है।
इस प्रकार, “को मोहः कः शोकः” केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि यह घोषणा है कि
ज्ञानी के लिए संसार का कोई अस्तित्व नहीं रहता, क्योंकि उसका कारण ही नष्ट हो चुका है।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने स्पष्ट किया है कि “को मोहः कः शोकः” के द्वारा मोह और शोक के अभाव को सिद्ध करते हुए, उनके कारण—अविद्या और कामना—का भी निषेध किया गया है। इससे कारण सहित संसार का पूर्ण उच्छेद सिद्ध होता है। यही आत्मज्ञान का परम फल है और अद्वैत वेदान्त का अंतिम निष्कर्ष।
मुकेश ,,,,,,,,
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