उस रात मृणाल ने बहुत दिनों बाद सपना देखा।
एक लंबा, अँधेरा गलियारा था।
दीवारों पर अधूरे चित्र टँगे थे— बिना आँखों वाले चेहरे, आधे बने हुए पेड़, और जलते हुए पीले आकाश।
गलियारे के अंत में वही लड़का खड़ा था— आर्यन।
उसके हाथ रंग से भरे थे।
हरा रंग।
गाढ़ा, सीलन-सा, बीमार हरा।
वह धीरे से बोला—
“मैडम… कुछ रंग मरते नहीं।”
मृणाल की नींद अचानक खुल गई।
कमरे में हल्का नीला अँधेरा था।
खिड़की से आती हवा दीवार पर लगे नए रंग को छू रही थी। वही हल्का नीला, जिसे उसने महीनों बाद अपने कमरे में लगाया था।
लेकिन उस रात पहली बार उसे लगा कि रंग केवल मनुष्य के भीतर नहीं रहते— वे जगहों में भी बस जाते हैं।
कमरों में।
पुरानी चीज़ों में।
स्पर्शों में।
और शायद स्मृतियों में सबसे अधिक।
अगले दिन कॉलेज पहुँची तो आर्यन नहीं आया था।
उसकी खाली कुर्सी के आसपास अजीब-सा सन्नाटा जमा था।
मृणाल ने बिना कुछ कहे उपस्थिति रजिस्टर बंद कर दिया।
तीसरे दिन भी वह नहीं आया।
उस शाम मृणाल स्वयं उसके घर चली गई।
शहर के पुराने हिस्से में एक तंग गली थी जहाँ नमी दीवारों से रिसती रहती थी। ऊपर तारों का जाल और नीचे गंदे पानी की पतली धारा।
दरवाज़ा उसकी माँ ने खोला।
बहुत थकी हुई स्त्री।
उसने बताया—
आर्यन कई दिनों से कमरे में बंद रहता है।
किसी से बात नहीं करता।
रात भर चित्र बनाता रहता है।
मृणाल धीरे-धीरे उसके कमरे तक गई।
दरवाज़ा आधा खुला था।
कमरे में घुसते ही उसे तेज़ टर्पेन्टाइन और गीले रंग की गंध महसूस हुई।
और फिर उसने दीवारें देखीं।
पूरा कमरा चित्रों से भरा था।
लेकिन इस बार उनमें केवल हरा रंग नहीं था।
कहीं गहरे नीले धब्बे थे।
कहीं अचानक फूटता हुआ लाल।
और बीच-बीच में सफेद खाली जगहें।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई मन धीरे-धीरे टूटने और बचने के बीच झूल रहा हो।
आर्यन खिड़की के पास बैठा था।
उसने मुड़कर देखा नहीं।
धीरे से बोला—
“क्या रंग सचमुच आदमी को बचा सकते हैं?”
मृणाल कुछ क्षण चुप रही।
फिर उसने कहा—
“नहीं।
लेकिन वे आदमी को यह बता सकते हैं कि वह भीतर से मर कहाँ रहा है।”
कमरे में चुप्पी भर गई।
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।
आर्यन ने पहली बार उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों के नीचे कई रातों की जागी हुई परछाइयाँ थीं।
“और अगर आदमी को पता चल जाए… तब?”
मृणाल ने उत्तर देने से पहले दीवार पर बने एक चित्र को देखा।
चित्र में एक स्त्री थी जिसके चेहरे की जगह केवल रंग थे— नीला, पीला, धूसर।
उसे अचानक अपना पुराना जीवन याद आया।
वह लाल दीवार।
पति की आवाज़।
और वह क्षण जब उसने पहली बार महसूस किया था कि भीतर की भाषा शब्दों से नहीं, रंगों से बनती है।
वह धीरे से बोली—
“तब शायद वह जीना शुरू करता है।”
उस दिन के बाद आर्यन कभी-कभी उसके घर आने लगा।
वे बहुत कम बातें करते।
कई बार केवल कैनवास सामने रखे बैठे रहते।
मृणाल ने देखा—
अब उसके चित्रों में खिड़कियाँ आने लगी थीं।
फिर पेड़।
फिर दूर कहीं छोटे-छोटे पक्षी।
लेकिन एक चीज़ अभी भी बनी हुई थी— हर चित्र के कोने में वह अजीब-सा हरा रंग।
एक दिन उसने पूछ ही लिया—
“तुम इसे छोड़ते क्यों नहीं?”
आर्यन मुस्कराया।
“क्योंकि आदमी पूरी तरह ठीक कभी नहीं होता।”
उस उत्तर ने मृणाल को भीतर तक छू लिया।
उसे लगा—
शायद सच यही है।
मनुष्य अपने अँधेरों से मुक्त नहीं होता।
वह केवल उनके साथ रहना सीखता है।
सर्दियाँ बीत गईं।
एक शाम दोनों कॉलेज की पुरानी छत पर बैठे थे।
सूरज डूब रहा था और आकाश में बैंगनी रंग धीरे-धीरे फैल रहा था।
आर्यन अचानक बोला—
“आप जानती हैं… मुझे पहले लगता था कि दुनिया का सबसे दुखी रंग हरा है।”
“और अब?”
उसने ऊपर आकाश की ओर देखा।
“अब लगता है… सबसे दुखी रंग शायद बैंगनी है।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसमें नीले का दुःख और लाल की स्मृति दोनों रहती हैं।”
मृणाल बहुत देर तक चुप रही।
फिर उसने पहली बार महसूस किया कि उसके भीतर वर्षों से जमा हुआ अकेलापन धीरे-धीरे किसी रंग की तरह हल्का पड़ रहा है।
नीचे शहर की बत्तियाँ जलने लगी थीं।
और उस सांझ में
उसे लगा
कुछ लोग हमारे जीवन में प्रेम की तरह नहीं आते।
वे आते हैं
जैसे किसी बहुत पुराने, धुँधले चित्र पर
धीरे-धीरे लौटता हुआ रंग।
मुकेश',,,,,,,,,,,,,,,
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