रंगों के पीछे छिपी हुई स्त्री - 3
हरिद्वार की वह संध्या असामान्य रूप से स्वच्छ थी।
बरसात अभी-अभी थमी थी।
दूर पहाड़ियों पर धुंध के हल्के धूसर टुकड़े अटके हुए थे।
नीचे गंगा अपने चौड़े, हरे-नीले प्रवाह में बह रही थी।
घाटों पर आरती की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
वे दोनों शहर से थोड़ा ऊपर बने एक पुराने पहाड़ी रिसॉर्ट की लकड़ी की बालकनी में बैठे थे।
सामने दूर-दूर तक रोशनियाँ थीं
मंदिरों की पीली लौ,
दुकानों के लाल बोर्ड,
श्रद्धालुओं के केसरिया वस्त्र,
और बीच-बीच में गंगा का लगभग काला पड़ता जल।
आर्यन देर से नदी को देख रहा था।
फिर उसने अचानक कहा
“अजीब बात है…
भारतीय देवताओं में कृष्ण और राम को कई बार श्याम या नीला-काला कहा गया है।
लेकिन पश्चिम में काला रंग अक्सर भय या मृत्यु का प्रतीक बन जाता है।”
मृणाल मुस्कराई।
“क्योंकि हर सभ्यता अपने डर के अनुसार रंग चुनती है।”
“लेकिन कृष्ण का रंग काला क्यों?”
मृणाल कुछ क्षण चुप रही।
नीचे घाटों पर घंटियाँ बजने लगी थीं।
शायद इसलिए कि काला रंग सबको अपने भीतर समा लेता है।
जैसे रात।
जैसे आकाश।
जैसे ब्रह्मांड।”
आर्यन अचानक उत्साहित हो उठा।
“यानी… black hole की तरह?”
मृणाल ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी जो किसी नए विचार के जन्म के समय आ जाती थी।
“हाँ… शायद।”
वह कुर्सी पर थोड़ा आगे झुक गई।
“देखो, black hole प्रकाश तक को निगल लेता है।
इसलिए वह दिखाई नहीं देता।
लेकिन कृष्ण का ‘श्याम’ रंग भी कुछ वैसा ही है—
वह एक ऐसा रंग है जिसमें बाकी सारे रंग समा जाते हैं।”
आर्यन कुछ देर तक सोचता रहा।
नीचे गंगा की लहरों पर आरती की लौ काँप रही थी।
“तो क्या काला वास्तव में रंग नहीं… अनुपस्थिति है?”
मृणाल ने सिर हिलाया।
“विज्ञान यही कहता है।
लेकिन मनोविज्ञान में काला कई बार पूर्णता भी होता है।”
“कैसे?”
“क्योंकि मनुष्य जिसे समझ नहीं पाता, उसे अँधेरा कह देता है।”
हवा में अगरबत्ती और भीगे पेड़ों की गंध घुली हुई थी।
दूर किसी मंदिर से शंख की आवाज़ आई।
आर्यन अब पूरी तरह बातचीत में डूब चुका था।
“एक बात और,” उसने कहा,
“अगर सूर्य इतना प्रचंड है… तो अंतरिक्ष से कई बार वह लगभग काला क्यों दिखाई देता है?”
मृणाल हल्के से हँसी।
“क्योंकि प्रकाश स्वयं दिखाई नहीं देता, आर्यन।
वह तभी दिखाई देता है जब किसी चीज़ से टकराता है।”
“यानी सूरज की किरणें सफेद हैं क्योंकि…”
“क्योंकि उनमें सारे रंग हैं।”
उसने सामने गंगा की ओर इशारा किया।
“देखो नदी को।
अभी वह काली लग रही है।
लेकिन सुबह यही नदी सुनहरी हो जाएगी।”
आर्यन धीरे-धीरे बोला
“तो वस्तुओं का कोई स्थायी रंग नहीं होता?”
“शायद नहीं।
रंग हमेशा संबंध से बनते हैं
प्रकाश और दृष्टि के संबंध से।
जैसे मनुष्य।”
उस वाक्य के बाद कुछ देर दोनों चुप रहे।
नीचे आरती शुरू हो चुकी थी।
सैकड़ों दीपक गंगा पर तैर रहे थे।
जल अब काला नहीं लग रहा था
उसमें हजारों सुनहरी रेखाएँ काँप रही थीं।
आर्यन ने धीरे से कहा
“क्या यही कारण है कि भारतीय दर्शन में ब्रह्म को कई बार ‘अंधकार से परे प्रकाश’ कहा गया है?”
मृणाल ने उसकी ओर देखा।
उसे हमेशा आश्चर्य होता था कि यह लड़का धीरे-धीरे रंगों से दर्शन तक कैसे पहुँच गया।
“हो सकता है,” उसने कहा।
“लेकिन सोचो,
कृष्ण का रंग काला है, शिव की जटाएँ अँधेरी हैं, माँ काली काली हैं…
शायद भारतीय चेतना अंधकार से डरती नहीं थी।
वह उसे गर्भ की तरह देखती थी।”
“गर्भ?”
“हाँ।
जहाँ सब कुछ जन्म लेने से पहले होता है।”
हवा अचानक ठंडी हो गई थी।
रिसॉर्ट की पीली रोशनी अब उनके चेहरों पर पड़ रही थी।
आर्यन ने नीचे बाज़ार की ओर देखा।
श्रद्धालु, पुजारी, व्यापारी, विदेशी पर्यटक
सब अपने-अपने रंगों में चलते हुए दिखाई दे रहे थे।
“देखिए,” उसने कहा,
“वहाँ कितना लाल है।”
मृणाल मुस्कराई।
“तीर्थों में लाल हमेशा अधिक होता है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मनुष्य जब ईश्वर के पास जाता है तो वह अपने भीतर की सबसे तीव्र इच्छा साथ ले जाता है
भय, प्रेम, मुक्ति, आशा…
और इन सबका सबसे निकट रंग लाल है।”
आर्यन कुछ देर तक उस लालिमा को देखता रहा।
फिर धीरे से बोला
“तो क्या आध्यात्मिकता भी रंग बदलती है?”
मृणाल ने सामने अँधेरे पहाड़ों की ओर देखा।
“हाँ।
पहले वह लाल होती है— इच्छा की तरह।
फिर केसरिया— त्याग की तरह।
और अंत में शायद…”
“काला?”
मृणाल ने बहुत धीमे सिर हिलाया।
“हाँ।
क्योंकि अंततः मनुष्य उसी में लौटता है जहाँ सारे रंग समाप्त हो जाते हैं।”
नीचे गंगा बहती रही।
दूर पहाड़ अब लगभग पूर्ण अंधकार में डूब चुके थे।
और उस रात पहली बार दोनों को लगा
शायद रंगों का अंतिम मनोविज्ञान कला में नहीं,
ब्रह्मांड में छिपा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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