वे कई महीनों की यात्राओं के बाद पृथ्वी के उस पूर्वी छोर तक पहुँच गए थे जहाँ भारत में सबसे पहले सूर्योदय दिखाई देता है।
पहाड़ों के बीच एक छोटा-सा स्थान।
ठंडी हवा।
दूर तक फैला अंधकार।
और क्षितिज के पीछे कहीं सोया हुआ समुद्र।
रात अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
लेकिन वहाँ लोग जाग चुके थे।
कुछ पर्यटक कैमरे लिए खड़े थे।
कुछ चुपचाप हाथ बाँधे पूर्व दिशा की ओर देख रहे थे।
किसी बच्चे की उनींदी आवाज़ हवा में तैर जाती और फिर तुरंत सन्नाटा लौट आता।
मृणाल और आर्यन भी चट्टानों के किनारे बैठ गए।
आर्यन ने घड़ी देखी।
“हमारे शहर में अभी रात के तीन बजे होंगे।”
मृणाल मुस्कराई।
“लेकिन यहाँ सूर्य जागने वाला है।”
उसने धीरे से कहा—
“समय भी रंगों की तरह सापेक्ष होता है।”
उनके सामने क्षितिज अब धीरे-धीरे बदलने लगा था।
पहले बहुत हल्का धूसर।
फिर उसमें नीले की पतली परत।
फिर अचानक कहीं बहुत दूर एक लगभग अदृश्य केसरिया रेखा।
और उसी क्षण पूरा आकाश जैसे साँस लेने लगा।
दोनों चुप हो गए।
उनके सामने प्रकाश जन्म ले रहा था।
आर्यन ने पहले कभी सूर्योदय को इतने ध्यान से नहीं देखा था।
उसे लगा—
सूर्य अचानक नहीं उगता।
वह अंधकार के भीतर धीरे-धीरे अपना रंग घोलता है।
पहले धूसर टूटता है।
फिर नीला पीछे हटता है।
फिर गुलाबी आता है।
फिर केसरिया।
और अंत में सुनहरी आग।
“देखिए…” उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा,
“आकाश रंग बदलते समय सबसे सुंदर होता है।”
मृणाल की आँखें क्षितिज पर टिकी थीं।
“क्योंकि परिवर्तन हमेशा स्थिरता से अधिक जीवित होता है।”
अब सूर्य का ऊपरी किनारा दिखाई देने लगा था।
लोगों में हलचल हुई।
कुछ ने हाथ जोड़ लिए।
कुछ तस्वीरें लेने लगे।
लेकिन मृणाल और आर्यन जैसे किसी सम्मोहन में बैठे थे।
उगता हुआ सूर्य पानी और बादलों के बीच एक जलती हुई धातु की तरह लग रहा था।
उसकी किरणें लगातार रंग बदल रही थीं—
सुनहरी, फिर नारंगी, फिर हल्की लालिमा।
आर्यन अचानक बोला—
“अब समझ आता है कि लोग सूर्य को देवता क्यों मानते थे।”
मृणाल मुस्कराई।
“क्योंकि मनुष्य प्रकाश को हमेशा चमत्कार की तरह देखता है।”
कुछ क्षण बाद उसने धीरे से कहा—
“और शायद इसलिए भी कि सूर्योदय हमें यह भ्रम देता है कि हर चीज़ फिर से शुरू हो सकती है।”
सूर्य अब पूरी तरह ऊपर आ चुका था।
समुद्र सुनहरी चमक से भर गया था।
लोग धीरे-धीरे लौटने लगे।
लेकिन वे दोनों अब भी वहीं बैठे थे।
आर्यन ने अचानक कहा—
“आपको Van Gogh याद आ रहा है?”
मृणाल ने उसकी ओर देखा।
“हाँ… विशेषकर उसके सूरज।”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर आर्यन बोला—
“उसके चित्रों में सूर्य वास्तविक नहीं लगता।
वह जैसे भीतर जलता हुआ सूर्य हो।”
मृणाल के चेहरे पर हल्की चमक आ गई।
उसे ऐसे क्षण पसंद थे जब कला और जीवन एक-दूसरे में घुलने लगते थे।
“Van Gogh सूर्य को देखता नहीं था,” उसने कहा,
“वह उसे महसूस करता था।”
“कैसे?”
“उसके पीले रंग को देखो।
वह प्राकृतिक पीला नहीं है।
वह मानसिक पीला है—
उत्तेजना, अकेलापन, प्रार्थना और पागलपन का मिला हुआ रंग।”
हवा अब हल्की गर्म होने लगी थी।
दूर समुद्र पर मछुआरों की नावें दिखाई देने लगीं।
आर्यन धीरे-धीरे बोला—
“क्या यही कारण है कि उसके सूरज सुंदर होते हुए भी बेचैन लगते हैं?”
“हाँ।”
मृणाल की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“Van Gogh के लिए सूर्य केवल प्रकाश नहीं था।
वह शायद जीवन की ऐसी तीव्रता था जिसे उसका मन सह नहीं पाता था।”
आर्यन ने आँखें बंद कर लीं।
उसे अचानक याद आया—
Van Gogh के सूरज हमेशा स्थिर नहीं होते।
वे काँपते हैं।
घूमते हैं।
जैसे आग स्वयं बेचैन हो।
“और उसके पीले खेत…” उसने कहा।
“हाँ,” मृणाल ने उत्तर दिया,
“वे केवल खेत नहीं हैं।
वे उस आदमी का अकेलापन हैं जो प्रकृति में ईश्वर खोज रहा था।”
कुछ देर बाद उसने धीरे से जोड़ा—
“महान कलाकार वस्तुओं का चित्र नहीं बनाते।
वे वस्तुओं के भीतर अपनी मानसिक अवस्था भर देते हैं।”
सूर्य अब ऊँचा हो चुका था।
आकाश का रंग हल्का नीला हो गया था।
आर्यन ने सामने फैलती हुई रोशनी को देखा।
“क्या हर कलाकार का अपना सूर्य होता है?”
मृणाल मुस्कराई।
“हाँ।
और कई बार वही सूर्य उसे जला भी देता है।”
उस वाक्य के बाद दोनों बहुत देर तक चुप रहे।
उनके सामने दिन पूरी तरह जन्म ले चुका था।
लेकिन भीतर कहीं उन्हें लग रहा था कि वे केवल सूर्योदय देखकर नहीं लौट रहे
वे प्रकाश के मनोविज्ञान का एक और रहस्य अपने भीतर लेकर जा रहे हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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