कॉलेज लौटने के बाद
जीवन फिर से अपनी पुरानी लय में आने लगा था।
वही लंबे गलियारे।
रंग और टर्पेन्टाइन की मिली हुई गंध।
पुरानी लकड़ी की मेज़ें।
और खिड़कियों से गिरती हुई धूप, जो दिन के अलग-अलग समय पर अलग रंग ले लेती थी।
लेकिन भीतर बहुत कुछ बदल चुका था।
आर्यन अब पहले जैसा नहीं रहा था।
उसकी आँखों के नीचे की धूसरता हल्की पड़ गई थी।
उसके चित्रों में अब खिड़कियाँ थीं।
दूर जाते रास्ते।
कभी-कभी पक्षी भी।
हाँ, एक चीज़ अब भी बची हुई थी—
हर चित्र के किसी कोने में
बहुत हल्का-सा काई जैसा हरा।
जैसे अँधेरा पूरी तरह कभी नहीं जाता।
उसी वर्ष कॉलेज में एक नई छात्रा आई।
पहले दिन जब वह स्टूडियो में दाखिल हुई,
तो मृणाल अनायास उसे देखती रह गई।
उसके भीतर रंग असामान्य ढंग से व्यवस्थित थे।
भूरे-सुनहरे बाल।
मूंगिया होंठ।
काली आँखों में कहीं हल्का भूरा घुला हुआ।
और त्वचा पर लगभग गुलाबी उजास।
ऐसा लगता था मानो किसी चित्रकार ने उसे बनाते समय बहुत सोच-समझकर रंग चुने हों।
उसका नाम था— ईरा।
आर्यन पहले दिन से ही उसके आसपास कुछ अधिक शांत रहने लगा।
धीरे-धीरे वे दोनों साथ बैठने लगे।
कैंटीन में देर तक बातें करते।
कॉलेज के बाद शहर की सड़कों पर घूमते।
और कई बार रंगों पर चर्चा करते-करते अचानक किसी बिल्कुल साधारण बात पर हँस पड़ते।
मृणाल दूर से उन्हें देखती रहती।
उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं होता था।
न ही कोई स्पष्ट प्रसन्नता।
बस एक बहुत धीमा-सा बोध।
जैसे कोई ऋतु चुपचाप बदल रही हो।
अब आर्यन की बातचीत बदल गई थी।
पहले वह black hole, कृष्ण का श्याम रंग, समुद्र का नीला, शहरों की धूसरता— इन सब पर घंटों बात करता था।
अब वह ईरा के बारे में बात करता।
उसकी आवाज़ के बारे में।
उसके स्केच बनाने के ढंग के बारे में।
उसके पसंदीदा रंगों के बारे में।
और मृणाल सुनती रहती।
उसे कभी-कभी लगता—
मनुष्य अंततः दर्शन नहीं, किसी दूसरे मनुष्य की ओर लौटता है।
लेकिन इसी समय मृणाल फिर से अपने भीतर उतरने लगी।
अब वह यात्राओं की नोटबुक नहीं खोलती थी।
न ही शहरों के रंगों पर नए निष्कर्ष लिखती।
वह केवल चुपचाप पढ़ती रहती।
भौतिकी।
अद्वैत।
रंग-सिद्धांत।
उपनिषद।
प्रकाश-विज्ञान।
और धीरे-धीरे उसके भीतर एक विचित्र निष्कर्ष आकार लेने लगा।
उसे लगने लगा
रंग वास्तव में होते ही नहीं।
वे केवल प्रकाश और अनुभव के बीच उत्पन्न होने वाली अस्थायी तरंगें हैं।
असल में केवल दो ही अवस्थाएँ हैं—
पूर्ण अवशोषण।
और पूर्ण परावर्तन।
काला और सफेद।
और शायद ये दोनों भी अलग नहीं।
मनुष्य जिस बिंदु पर खड़ा होता है, उसी के अनुसार वह किसी चीज़ को प्रकाश कहता है या अंधकार।
उसने अपनी डायरी में लिखा—
“काला और सफेद विरोधी नहीं हैं।
वे एक ही मौन के दो अनुभव हैं।”
उसके बाद उसने कई दिनों तक कोई चित्र नहीं बनाया।
स्टूडियो में कैनवास खाली पड़े रहे।
एक शाम, जब कॉलेज लगभग खाली हो चुका था,
वह अकेली अपने बड़े स्टूडियो में गई।
बाहर हल्की बारिश हो रही थी।
कमरे में केवल एक पीली लैंप जल रही थी।
उसने बहुत बड़ा कैनवास निकाला।
और फिर घंटों तक बिना रुके काम करती रही।
न कोई स्केच।
न कोई आकृति।
सिर्फ दो विस्तार।
कैनवास का एक भाग— पूर्ण काला।
दूसरा— पूर्ण सफेद।
बीच में कोई रेखा भी नहीं।
जैसे दोनों एक-दूसरे में धीरे-धीरे विलीन हो रहे हों।
चित्र पूरा होने के बाद वह बहुत देर तक उसे देखती रही।
उसे लगा
वर्षों से जिन रंगों का पीछा करती रही, वे सब इसी मौन से निकलते थे।
लाल।
नीला।
हरा।
पीला।
सभी केवल अनुभव की तरंगें थे।
मूल में शायद कुछ भी रंगीन नहीं था।
उसी समय दरवाज़ा खुला।
आर्यन अंदर आया।
उसके हाथ में ईरा का छोड़ा हुआ स्केचबुक था।
वह कुछ कहना चाहता था,
लेकिन सामने कैनवास देखकर रुक गया।
बहुत देर तक दोनों चुप रहे।
फिर आर्यन ने धीमे से पूछा
“यह क्या है?”
मृणाल की आँखें अब भी चित्र पर टिकी थीं।
“शायद… रंगों के बाद की जगह।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
बारिश की आवाज़ और गहरी हो गई थी।
फिर अचानक मृणाल ने अपना पुराना रंग-बक्सा उठाया।
एक-एक ट्यूब को देखा।
वे सारे रंग जिनके साथ उसने वर्षों बिताए थे।
और बिना किसी नाटकीयता के
उसने वह बक्सा कमरे के कोने में फेंक दिया।
फिर अपने ब्रश उठाए।
धीरे-धीरे उन्हें तोड़ दिया।
आर्यन स्तब्ध खड़ा रहा।
लेकिन मृणाल के चेहरे पर विचित्र शांति थी।
जैसे कोई लंबी यात्रा समाप्त हुई हो।
या शायद शुरू।
उस रात देर तक वह अकेली उसी कैनवास के सामने बैठी रही।
काला धीरे-धीरे सफेद में घुलता हुआ।
सफेद धीरे-धीरे काले में।
और उन दोनों के बीच
एक ऐसी निस्तब्धता
जिसका कोई रंग नहीं था।
उसे पहली बार लगा
शायद सत्य रंगों में नहीं था।
रंगों के पार था।
वहाँ
जहाँ सब कुछ समाहित हो जाता है।
और जहाँ अंततः
कुछ भी अलग नहीं बचता।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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