प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — नवम मंत्र
संवत्सर, दक्षिणायन, पितृयान और कर्ममार्ग का उपनिषदिक रहस्य
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
संवत्सरो वै प्रजापतिः ।
तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च ।
तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ।
ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते ।
ते एव पुनरावर्तन्ते ।
तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते ।
एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥९॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
संवत्सर ही प्रजापति है। उसके दो अयन हैं — दक्षिणायन और उत्तरायण।
जो लोग इष्ट और पूर्त आदि कर्मों को ही श्रेष्ठ मानकर उनका उपासना-भाव से पालन करते हैं, वे चन्द्रलोक को प्राप्त होते हैं; किन्तु वहाँ से पुनः लौट आते हैं।
इसी कारण संतान और लौकिक फल की इच्छा रखने वाले ऋषिगण दक्षिण मार्ग को ग्रहण करते हैं। यह दक्षिणमार्ग ही रयि तथा पितृयान है।
भावार्थ
यह मंत्र भारतीय दर्शन के दो महत्त्वपूर्ण मार्गों का संकेत करता है —
· पितृयान (कर्ममार्ग)
· देवयान (ज्ञानमार्ग)
जो लोग केवल कर्मफल, स्वर्ग और लौकिक सिद्धियों की इच्छा रखते हैं, वे चन्द्रलोक तक पहुँचते हैं, पर पुनर्जन्म से मुक्त नहीं होते।
अन्वय
संवत्सरः वै प्रजापतिः।
तस्य दक्षिणं च उत्तरं च द्वे अयने।
ये ह वै इष्टापूर्ते कृतम् इति उपासते, ते चान्द्रमसम् एव लोकम् अभिजयन्ते।
ते एव पुनः आवर्तन्ते।
तस्मात् एते ऋषयः प्रजाकामाः दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते।
एषः ह वै रयिः यः पितृयाणः।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
संवत्सरो | संवत्सरः | रूपसिद्धि |
तस्यायने | तस्य + अयने | स्वर संधि |
चोत्तरं | च + उत्तरम् | स्वर संधि |
तद्ये | तत् + ये | व्यंजन संधि |
चान्द्रमसमेव | चान्द्रमसम् + एव | व्यंजन संधि |
पुनरावर्तन्ते | पुनः + आवर्तन्ते | विसर्ग संधि |
प्रजाकामा | प्रजा + कामाः | समास |
पितृयाणः | पितॄणां यानम् | षष्ठीतत्पुरुष |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. संवत्सरः - वर्ष। यहाँ केवल काल नहीं; ब्रह्माण्डीय चक्र। शंकराचार्य इसे प्रजापति का स्वरूप कहते हैं।
२. अयन :- गमन, मार्ग। दक्षिणायन और उत्तरायण यहाँ आध्यात्मिक मार्गों के प्रतीक हैं।
३. इष्टापूर्त : - वैदिक कर्मों के दो प्रकार —
इष्ट | पूर्त |
यज्ञादि वैदिक कर्म | लोकहित कार्य |
४. चान्द्रमस लोक : - चन्द्रलोक। कर्मफल भोग का क्षेत्र।
५. पुनरावर्तन : -पुनर्जन्म। संसारचक्र में वापसी।
६. पितृयान : - कर्ममार्ग। लौकिक फल की ओर ले जाने वाला मार्ग।
आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)
तदेषः कालः संवत्सरः वै प्रजापतिः तन्निमित्तत्वात् सर्वसंवत्सरस्य। चन्द्रादित्यनिर्वर्तितो हि संवत्सरः तदनन्यत्वात् रयिप्राणात्मकत्वेन प्रजापतिरित्युच्यते। तत्कथम्? तस्य संवत्सरस्य प्रजापतेः अयने भागौ दक्षिणं च उत्तरं च। द्वे प्रसिद्धे ह्ययने षण्मासात्मकत्वेन। याभ्यां दक्षिणोत्तरेण च याति सविता। केवलकर्मिणां ज्ञानसंयुक्तकर्मवतां च लोकावधारणार्थम्। कथं तु? तत्र च ये दक्षिणाद् ऋतुभ्यः प्रवृत्ताः इष्टापूर्तम् इत्यादिकर्मोपासते, न अनित्यत्वं जानन्ति, ते चान्द्रमसं लोकम् अभिजयन्ते। कृतरूपसाध्यत्वात् चान्द्रमसस्य। ते तत्रैव च क्षीणपुण्याः पुनरावर्तन्ते। यस्मात् एवम् प्रजापतेः अन्नात्मकं रयित्वनामचक्रं चन्द्रमसम् प्रतिपद्यन्ते, तस्मात् ऋषयः स्वर्गदृष्टयः प्रजाकामाः दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एषः ह वै रयिः यः पितृयाणः॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं —
संवत्सर स्वयं प्रजापति है, क्योंकि सम्पूर्ण कालचक्र उसी पर आधारित है।
सूर्य और चन्द्र के द्वारा निर्मित यह संवत्सर रयि और प्राण का संयुक्त स्वरूप है।
इसके दो अयन हैं — दक्षिणायन ,उत्तरायण
दक्षिणमार्ग उन लोगों के लिए है जो इष्टापूर्त आदि कर्मों का अनुष्ठान करते हैं और उन्हें ही सर्वोच्च मानते हैं।
वे चन्द्रलोक को प्राप्त होते हैं, किन्तु वहाँ पुण्य क्षीण होने पर पुनः जन्म लेते हैं।
इसलिए जो लोग प्रजा, स्वर्ग और लौकिक फल चाहते हैं, वे पितृयानरूप दक्षिणमार्ग का अनुसरण करते हैं।
दार्शनिक विवेचन
१. संवत्सर = प्रजापति -यह अत्यन्त गहरा प्रतीक है। काल ही सृष्टि का नियामक है।
इसलिए संवत्सर को प्रजापति कहा गया।
२. दक्षिणायन और उत्तरायण - ये केवल खगोलीय अवस्थाएँ नहीं।ये जीवनदृष्टियाँ हैं।
दक्षिणायन | उत्तरायण |
कर्म | ज्ञान |
चन्द्र | सूर्य |
पुनर्जन्म | मोक्ष |
पितृयान | देवयान |
३. इष्टापूर्त की सीमा : - उपनिषद् कर्म का निषेध नहीं करता। किन्तु कहता है —
केवल कर्म मोक्ष नहीं दे सकता। कर्म स्वर्ग देता है; ज्ञान मुक्ति।
४. चन्द्रलोक का अर्थ ;- चन्द्र यहाँ भोग और परिवर्तनशीलता का प्रतीक है।अतः चन्द्रलोक स्थायी नहीं।
५. पुनरावर्तन :- यह संसारचक्र का सिद्धान्त है।जब तक आत्मज्ञान नहीं, तब तक पुनर्जन्म।
६. पितृयान :- “पितृयान” पूर्वजों और कर्मपरम्परा का मार्ग है।यह परम्परा और संसार की निरन्तरता बनाए रखता है।
अन्य उपनिषदों से साम्य
छान्दोग्य उपनिषद् में देवयान और पितृयान का विस्तृत वर्णन है।
बृहदारण्यक उपनिषद् : कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग का स्पष्ट भेद मिलता है।
भगवद्गीता : -“शुक्लकृष्णे गती ह्येते…”(अध्याय ८)
शोधपूर्ण निबंध
पितृयान और देवयान : भारतीय जीवनदर्शन के दो पथ
प्रश्नोपनिषद् का नवम मंत्र भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त को प्रस्तुत करता है — द्विमार्ग सिद्धान्त।
भारतीय दर्शन मानव जीवन को केवल जैविक अस्तित्व नहीं मानता। वह उसे आध्यात्मिक यात्रा समझता है। इस यात्रा के दो पथ हैं — कर्मप्रधान पथ, ज्ञानप्रधान पथ।
दक्षिणायन या पितृयान उस मनुष्य का मार्ग है जो संसार, परिवार, यज्ञ, परम्परा और स्वर्ग की आकांक्षा में जीवन बिताता है। यह मार्ग निन्दित नहीं; यह सामाजिक व्यवस्था का आधार है।
किन्तु उपनिषद् यह भी कहता है कि यह अंतिम सत्य नहीं। क्योंकि कर्मफल क्षणिक हैं।
चन्द्रलोक यहाँ प्रतीक है — परिवर्तनशील सुख का, अस्थायी उपलब्धि का, तथा पुनर्जन्म के चक्र का।
इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् वैदिक कर्मकाण्ड का अतिक्रमण करते हुए वेदान्त की ओर अग्रसर होता है।
प्रश्नोपनिषद् का नवम मंत्र कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग के भेद को उद्घाटित करता है।
यह बताता है कि —
· कर्म संसार को बनाए रखता है,
· पर ज्ञान संसार से मुक्त करता है।
संवत्सर, अयन, चन्द्र और पितृयान — ये सभी प्रतीक मानव जीवन की आध्यात्मिक अवस्थाओं का गहन दार्शनिक निरूपण बन जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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