वह स्त्री हमेशा थोड़ी बेहतर ज़िन्दगी की प्रतीक्षा में रही
अब जब उसके बारे में सोचता हूँ, तो मुझे हमेशा चाय याद आती है।
अजीब बात है, किसी व्यक्ति की स्मृति कई बार किसी वस्तु में बस जाती है। उसके मामले में वह चाय थी — थोड़ी ज़्यादा चीनी वाली।
इतनी नहीं कि पी न जा सके, लेकिन इतनी अवश्य कि हर घूँट के साथ हल्की-सी अतिरिक्त मिठास महसूस हो।
उसका व्यक्तित्व भी कुछ वैसा ही था।
पहली मुलाक़ात में वह अत्यन्त विनम्र, पढ़ी-लिखी और सन्तुलित लगती। बातचीत में बुद्धिमत्ता थी, भाषा साफ़, और चेहरा भले पारम्परिक अर्थों में बहुत सुंदर न हो, लेकिन उसकी आँखों की चमक लोगों को देर तक बाँधे रखती।
वह सुनना जानती थी। और यह गुण दुर्लभ होता जा रहा है।
लेकिन कुछ समय उसके साथ बिताने के बाद धीरे-धीरे एक दूसरी परत दिखाई देने लगती थी — एक हल्का आत्ममुग्ध भाव, जिसे वह स्वयं भी शायद पूरी तरह नहीं पहचानती थी।
वह अपने परिवार के बारे में बहुत साधारण ढंग से बातें करती, लेकिन उन बातों के भीतर एक महीन गर्व लगातार बहता रहता।
“हमारे यहाँ तो…”
“पापा ने हमेशा…”
“हम लोग ऐसे वातावरण से आते हैं…”
वाक्य सामान्य होते, स्वर भी सामान्य, लेकिन उनमें एक अदृश्य ऊँचाई बनी रहती।
मानो वह संसार को लगातार यह याद दिलाना चाहती हो कि वह सामान्य लोगों जैसी नहीं है।
हालाँकि वस्तुतः उसका परिवार सम्पन्न अवश्य था, पर असाधारण नहीं।
लेकिन मनुष्य कई बार अपने भीतर की असुरक्षाओं को वंश, संस्कार या स्वाद की भाषा में छिपा लेता है।
उसका विवाह बहुत पहले हो चुका था और टूट भी चुका था।
उसके बाद जीवन में कुछ सम्बन्ध आए। कुछ भावनात्मक, कुछ आधे-अधूरे, कुछ केवल सम्भावनाएँ।
लेकिन हर सम्बन्ध का अन्त लगभग एक जैसा हुआ।
शुरू में वह सामने वाले पुरुष से बहुत प्रभावित दिखाई देती। देर रात तक बातें। साहित्य, संगीत, अकेलापन, बचपन, विश्वासघात — हर विषय पर गहरी आत्मीयता।
पुरुष को लगता, उसने अन्ततः किसी ऐसी स्त्री को पा लिया है जो उसे सचमुच समझती है।
लेकिन जैसे ही सम्बन्ध थोड़ा वास्तविक होने लगता, उसके भीतर एक धीमी असन्तुष्टि जन्म लेने लगती।
उसे लगता —
यह आदमी उतना गम्भीर नहीं जितना शुरू में लगा था।
या उतना सफल नहीं।
या पर्याप्त refined नहीं।
या बहुत साधारण इच्छाओं वाला।
धीरे-धीरे वह पीछे हट जाती।
एक बार उसने मुझसे कहा था —
“मुझे लगता है मैं गलत समय में पैदा हुई हूँ। अब वैसे पुरुष रहे ही नहीं।”
उस समय वह खिड़की के बाहर देख रही थी। शाम हो रही थी। उसके चेहरे पर हल्की उदासी थी, लेकिन उसमें थोड़ी अभिनयात्मक सुंदरता भी थी।
मैंने पूछा —
“कैसे पुरुष?”
वह कुछ क्षण सोचती रही। फिर बोली —
“जो बुद्धिमान हों… सुसंस्कृत हों… सफल हों… और भावनात्मक रूप से पूरी तरह committed भी।”
वह हँसी।
“मतलब लगभग असम्भव।”
लेकिन मुझे लगा, भीतर से वह सचमुच ऐसे ही किसी पुरुष की प्रतीक्षा कर रही थी — जैसे किसी पुराने उपन्यास का घोड़े पर चढ़ा राजकुमार, जो धनवान भी हो, नैतिक भी, बुद्धिमान भी, और अपनी सारी भावनात्मक ऊर्जा केवल उसी पर केन्द्रित रखे।
समस्या यह नहीं थी कि उसकी अपेक्षाएँ बड़ी थीं।
समस्या यह थी कि वह वास्तविक मनुष्यों की सीमाओं को स्वीकार नहीं कर पाती थी।
हर आदमी कुछ दिनों बाद उसे अधूरा लगने लगता।
और शायद हर आदमी को भी कुछ समय बाद महसूस होने लगता कि वह उसके सामने हमेशा किसी अदृश्य परीक्षा में खड़ा है।
लेकिन उसके व्यक्तित्व का सबसे विचित्र पक्ष उसका क्रोध था।
सामान्य अवस्था में वह बहुत शालीन भाषा बोलती। शब्द चुनकर। धीरे। लगभग बौद्धिक विनम्रता के साथ।
लेकिन गुस्से में अचानक उसके भीतर से ऐसी भद्दी गालियाँ निकलतीं कि सुनने वाला चौंक जाए।
वे गालियाँ उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती थीं।
पहली बार जब मैंने उसे इस तरह बोलते सुना, तो मुझे लगभग असुविधा हुई। ऐसा लगा जैसे किसी सुसज्जित कमरे की दीवार अचानक टूट गई हो और भीतर से कोई दबा हुआ अँधेरा बाहर आ गया हो।
बाद में समझ आया — सभ्यता कई बार केवल सतह होती है।
उसके भीतर एक गहरा आक्रोश था।
समय से।
पुरुषों से।
अपने असफल सम्बन्धों से।
और शायद स्वयं से भी।
क्योंकि उम्र बढ़ रही थी और उसके भीतर का आदर्श अब भी टूटा नहीं था।
धीरे-धीरे उसके आसपास मित्र कम होते गए।
पुराने प्रेमी विवाह कर चुके थे या दूर जा चुके थे। कुछ लोग उससे अब भी बात करते, लेकिन एक सुरक्षित दूरी बनाकर।
अब वह अक्सर सोशल मीडिया पर लम्बी बातें लिखती — प्रेम, ईमानदारी, भावनात्मक परिपक्वता, toxic पुरुषों, आत्मसम्मान पर।
उन्हें पढ़कर लगता जैसे वह अब भी किसी संवाद में है — किसी ऐसे व्यक्ति से, जो अभी आया नहीं।
एक बार बहुत वर्षों बाद मैं उससे मिला।
चेहरे पर उम्र उतर आई थी, लेकिन आँखों की चमक वैसी ही थी।
हमने चाय पी।
चाय अब भी थोड़ी ज़्यादा मीठी थी।
बातों-बातों में उसने अचानक कहा —
“तुम्हें नहीं लगता… लोग अब प्रेम करने लायक ही नहीं रहे?”
मैंने उसकी ओर देखा।
उस क्षण मुझे पहली बार स्पष्ट लगा कि वह जीवन भर किसी पुरुष की नहीं, एक अनुभव की तलाश में रही थी।
ऐसे प्रेम की, जो उसे स्वयं उसकी कल्पना के बराबर महसूस करा सके।
लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम इतने पूर्ण रूप में बहुत कम आता है।
वह समझौते, ऊब, गलतफहमियाँ, शरीर, थकान और दोहराव के बीच धीरे-धीरे बनता है।
और शायद इसी कारण वह हर बार आरम्भ के थोड़ी देर बाद पीछे हट जाती थी।
क्योंकि उसे प्रेम से अधिक उसकी चमक प्रिय थी।
उस रोशनी से पहले का क्षण
जब सब कुछ अभी सम्भव लगता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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