वह स्त्री जिसे प्रेम से अधिक उसकी संभावना प्रिय थी
अब जब उसके बारे में सोचता हूँ, तो सबसे पहले उसका चेहरा नहीं याद आता।
सबसे पहले उसकी आँखें याद आती हैं।
वे बहुत चमकीली आँखें थीं — असामान्य रूप से सजग, जैसे सामने वाले को केवल सुन नहीं रहीं, भीतर तक पढ़ रही हों।
उसका रंग साँवला था। चेहरा पारम्परिक अर्थों में बहुत सुंदर नहीं कहा जा सकता था, लेकिन उसके नाक-नक्श तीखे थे और व्यक्तित्व में ऐसी बौद्धिक सतर्कता थी कि लोग जल्दी उसकी ओर आकर्षित हो जाते।
वह बोलती थी, तो सामने वाला अपने आपको थोड़ा अधिक महत्वपूर्ण महसूस करने लगता। शायद इसलिए कि वह ध्यान से सुनती थी।
और ध्यान से सुने जाने की मनुष्य की भूख बहुत पुरानी है।
मैं उसे बहुत वर्षों से जानता था।
वह उन स्त्रियों में से थी जिनके बारे में पहली नज़र में कोई असामान्यता दिखाई नहीं देती। नौकरी करती थी, किताबें पढ़ती थी, राजनीति और साहित्य पर बात कर लेती थी, हँसती भी थी।
लेकिन धीरे-धीरे उसके सम्बन्धों में एक विचित्र पैटर्न दिखाई देने लगता।
उसका विवाह हुआ था, लेकिन अधिक समय नहीं चला।
उसने कभी स्पष्ट कारण नहीं बताया। केवल इतना कहती —
“हम लोग एक-दूसरे के लिए नहीं बने थे।”
फिर कुछ वर्षों तक वह एक पुरुष के साथ सम्बन्ध में रही। उस समय वह बहुत बदली हुई दिखाई देती थी — अधिक कोमल, अधिक जीवित।
लेकिन अचानक एक दिन वह सम्बन्ध भी समाप्त हो गया।
बाद में उसने उस पुरुष के बारे में इस तरह बात करनी शुरू की जैसे वह शुरू से ही साधारण आदमी था और उससे कोई विशेष अपेक्षा रखना उसकी भूल रही हो।
धीरे-धीरे मैंने एक बात नोटिस की।
उसे पुरुषों से बातचीत पसन्द थी।
बहुत पसन्द।
वह उनसे घंटों बात कर सकती थी — किताबों पर, अकेलेपन पर, बचपन की स्मृतियों पर, यहाँ तक कि उनके विवाहों की असफलताओं पर भी।
उसकी आवाज़ में ऐसी आत्मीयता आ जाती कि सामने वाला अक्सर भ्रमित हो उठता।
उसे लगता, यह केवल बातचीत नहीं है।
लेकिन जैसे ही कोई पुरुष उस आत्मीयता को प्रेम की दिशा देने की कोशिश करता, वह बदल जाती।
अचानक उसे उसमें कमियाँ दिखाई देने लगतीं।
किसी की हँसी बहुत ऊँची लगती।
किसी का पहनावा असभ्य।
कोई पर्याप्त संवेदनशील नहीं।
कोई बहुत भावुक।
कोई बहुत व्यावहारिक।
वह धीरे-धीरे दूरी बना लेती।
और विचित्र बात यह थी कि दूरी बनाते समय उसके भीतर अपराध-बोध बहुत कम होता।
मानो उसके लिए सम्बन्ध केवल तब तक आकर्षक थे जब तक वे सम्भावना बने रहते।
जैसे ही वे वास्तविक होने लगते, वे उसे बोझिल और अपूर्ण दिखाई देने लगते।
एक बार उसने मुझसे कहा था —
“पुरुष शुरू में बहुत अच्छे लगते हैं… बाद में साधारण हो जाते हैं।”
उस समय वह हँस रही थी, लेकिन उस हँसी में हल्की थकान थी।
मैंने उससे पूछा —
“शायद वे शुरू से ही साधारण होते हैं?”
वह कुछ क्षण चुप रही। फिर बोली —
“हो सकता है। लेकिन कल्पना में लोग ज़्यादा सुंदर लगते हैं।”
अब सोचता हूँ, उसके भीतर प्रेम से अधिक उसकी कल्पना के प्रति आसक्ति थी।
वास्तविक सम्बन्धों में जो अव्यवस्था, दोहराव, शारीरिकता और समझौते होते हैं, वे उसे धीरे-धीरे घबराने लगते।
वह स्वयं को बहुत चरित्रवान मानती थी। कई बार लगभग नैतिक ऊँचाई के साथ दूसरों के सम्बन्धों की आलोचना करती।
लेकिन जीवन केवल विचारों से नहीं चलता।
जब उसे भावनात्मक सहारे, अकेलेपन से राहत या शारीरिक निकटता की आवश्यकता हुई, तब उसने अपने सिद्धान्तों में चुपचाप ढील भी दी।
हालाँकि बाद में वह उन प्रसंगों को इस तरह याद करती जैसे परिस्थितियों ने उससे सब कुछ करवा लिया हो।
मनुष्य अपने बारे में जो कथा बनाता है, वह हमेशा पूरी तरह सत्य नहीं होती।
वह भी अपने भीतर एक ऐसी छवि सँजोए रहती थी जिसमें वह दूसरों से अधिक सच्ची, अधिक गम्भीर और अधिक नैतिक दिखाई दे।
शायद उसी छवि को बचाने के लिए वह हर उस पुरुष से दूर हो जाती थी जो उसे बहुत पास से देखने लगता।
क्योंकि निकटता केवल प्रेम नहीं लाती — वह भ्रम भी तोड़ देती है।
उसकी उम्र धीरे-धीरे बढ़ती गई।
अब उसके चेहरे पर हल्की थकान रहने लगी थी। लेकिन उसकी आँखों की चमक कम नहीं हुई थी।
आज भी जब वह किसी पुरुष से बात करती है, तो कुछ देर बाद वही पुरानी आत्मीयता पैदा हो जाती है। सामने वाला सोचने लगता है कि शायद इस बार बात अलग है।
लेकिन मैं अब जानता हूँ कि वह प्रेम में नहीं पड़ती।
वह प्रेम के आरम्भिक प्रकाश में खड़ी रहना चाहती है — उस क्षण में, जब सब कुछ अभी सम्भव है और कुछ भी पूरी तरह वास्तविक नहीं हुआ।
क्योंकि वास्तविक प्रेम में मनुष्य को केवल दूसरे को नहीं, स्वयं को भी स्वीकार करना पड़ता है।
और शायद वही काम उसके लिए सबसे कठिन था।
मुकेश ,,,,,,,,,
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